मासी के साथ छुट्टियाँ। 3
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रात गहरी हो चुकी थी।
डिनर के बाद तीनों बेड पर आ गए। मासी एक तरफ लेटी थीं। प्रिया मेरे दूसरी तरफ।
मैंने प्रिया का चेहरा अपनी तरफ किया। “कितने दिन हो गए?”
प्रिया ने हल्के से मुस्कुराते हुए कहा, “काफी दिन…”
मैंने उसके कपड़े उतारने शुरू कर दिए। टॉप, ब्रा, जींस, पैंटी। जल्दी ही वो नंगी हो गई। मैंने भी कपड़े उतार दिए। मेरा लंड पूरी तरह तन चुका था।
प्रिया को लिटा दिया। दोनों पैर फैलाए। लुब्रिकेंट लगाया और कंडोम पहना। फिर बिना ज्यादा देर किए लंड उसके चूत पर रखा और एक झटके में अंदर डाल दिया।
प्रिया की जोरदार कराह निकली। “आह्ह… किरण…!”
मैं रुका नहीं। तुरंत जोर-जोर से पेलने लगा। काफी दिनों बाद मिली थी। गुस्सा और भूख दोनों निकले। हर ठोकर भारी और गहरी थी। प्रिया के स्तन जोर-जोर से हिल रहे थे। मैंने उसके दोनों हाथ सिर के ऊपर पकड़ लिए और बिना रुके मारने लगा।
प्रिया की आँखों में आँसू आ गए। “किरण… धीरे… बहुत जोर से…!”
मैंने नहीं सुना। रफ्तार और बढ़ा दी। बिस्तर जोर-जोर से चरमरा रहा था। प्रिया की चूत कई दिनों बाद इतनी कसकर चोदी जा रही थी कि वो तड़प रही थी। आँसू उसके गालों पर बहने लगे। वो रोते हुए कराह रही थी।
“दर्द… किरण… थोड़ा धीरे… आआह्ह्ह…!”
मैंने उसके पैर अपने कंधों पर रख दिए और और गहराई तक पेलने लगा। पूरा लंड हर बार जड़ तक जा रहा था। प्रिया जोर-जोर से रोने लगी। आवाज़ में दर्द साफ था। उसके नाखून मेरी पीठ पर गड़ गए।
मैंने उसके बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा और और तेज ठोकरें मारीं। प्रिया की चीखें निकल रही थीं। रोना बंद नहीं हो रहा था। मासी बगल में लेटी सब देख रही थीं।
बीस… तीस… चालीस मिनट।
मैं थकता नहीं था। प्रिया की चूत अब पूरी तरह खुल चुकी थी, लेकिन मैं फिर भी जोर से मार रहा था। उसके आँसू तकिए को गीला कर चुके थे। वो बीच-बीच में मेरे नाम लेकर गिड़गिड़ाती—“किरण… बहुत हो गया… रुक…!” लेकिन मैं नहीं रुका।
पचास मिनट के आसपास प्रिया की टाँगें काँपने लगीं। शरीर अकड़ गया और वो जोर से चिल्लाते हुए चरम पर पहुँची। फिर भी मैं पेलता रहा। कुछ और देर तक जोर-जोर से मारा। आखिर में मेरा पानी निकल गया।
मैं उसके ऊपर गिर गया। दोनों की साँसें उखड़ी हुई थीं। प्रिया अभी भी हल्के-हल्के रो रही थी। आँखें लाल थीं। चूत से कंडोम और उसकी नमी की मिलावट बह रही थी।
काफी दिनों बाद का ये राउंड काफी जोरदार रहा था।
प्रिया को ज्यादा दर्द नहीं हुआ था। मैं उससे पहले कई बार चुद चुका था। उसकी चूत मेरी आदत की हो चुकी थी।
थोड़ी देर आराम करने के बाद मेरा लंड फिर से सख्त हो गया। प्रिया अभी भी मेरे बगल में नंगी लेटी थी। साँसें सामान्य हो रही थीं। आँखें थोड़ी लाल थीं, लेकिन वो विरोध नहीं कर रही थी।
मैंने उसे दोबारा लिटा दिया। दोनों पैर फैलाए। कंडोम बदला और लुब्रिकेंट लगाकर फिर से अंदर डाल दिया।
इस बार कोई धीरे-धीरे शुरू नहीं किया। सीधा जोरदार ठोकरें शुरू कर दीं।
प्रिया की कराह निकली। “आह्ह… किरण… फिर से…!”
मैंने उसके कूल्हे पकड़ लिए और तेज-तेज पेलने लगा। काफी दिनों बाद मिली थी, इसलिए भूख अभी भी बाकी थी। हर धक्के के साथ उसका शरीर हिल रहा था। स्तन ऊपर-नीचे हो रहे थे। मैंने झुककर दोनों निप्पल मुँह में ले लिए और जोर से चूसने लगा।
मासी बगल में करवट लेकर लेटी सब देख रही थीं। उनकी आँखें खुली हुई थीं। दर्द के बावजूद वो नज़र नहीं हटा रही थीं।
मैंने रफ्तार बढ़ा दी। ठोकरें गहरी और भारी होने लगीं। प्रिया की चूत गीली हो चुकी थी। आवाज़ साफ आ रही थी। वो कभी-कभी मेरे बाल पकड़ लेती, कभी मेरी पीठ पर नाखून चला देती।
“जोर से… ऐसे ही…” प्रिया ने खुद कहा।
मैंने उसके पैर अपने कंधों पर रख दिए। इस पोजीशन में लंड और गहरा जा रहा था। प्रिया की आँखें बंद हो गईं। मुँह से लगातार कराहें निकल रही थीं। मैंने बिना रुके पचास मिनट तक लगभग एक जैसी रफ्तार से मारा।
बीच-बीच में पोजीशन बदलता रहा। कभी मिशनरी, कभी उसके पैर फैलाकर, कभी उसे साइड में लिटाकर। हर बार जोर बनाए रखा। प्रिया की चूत अब पूरी तरह खुल चुकी थी। वो चरम के करीब पहुँच रही थी।
करीब चालीस मिनट बाद प्रिया की टाँगें काँपने लगीं। शरीर अकड़ गया और वो जोर से चिल्लाते हुए पानी में भीग गईं। उसकी चूत मेरे लंड को जोरों से निचोड़ रही थी। मैं रुका नहीं। कुछ और ठोकरें मारीं।
पचास मिनट पूरे होने वाले थे। मेरी साँसें तेज हो गईं। शरीर अकड़ गया। गर्म वीर्य कंडोम में छूट गया। एक… दो… तीन झटके। मैं प्रिया के ऊपर गिर गया।
दोनों की साँसें उखड़ी हुई थीं। पसीने से शरीर चमक रहे थे।
मासी बगल में चुपचाप लेटी हुई देखती रहीं।
दूसरा राउंड भी खत्म हो चुका था।
दूसरा राउंड खत्म होने के बाद प्रिया ने करवट ली और मासी की तरफ देखा। मासी अभी भी कपड़े पहने लेटी हुई थीं। दर्द के मारे ज्यादा हिल नहीं पा रही थीं।
प्रिया बोली, “तुम क्यों कपड़े पहन के देख रही हो हमें? तुम भी आ जाओ।”
मासी ने सिर हिलाया, “नहीं… मेरी चूत सूज गई है।”
प्रिया मुस्कुराई, “दिखा तो सही।”
मासी मना करती रहीं, लेकिन प्रिया जैसे-तैसे उनके कपड़े उतारने लगी। नाइट ड्रेस ऊपर खींच दी। मासी ने हाथ से रोकने की कोशिश की, लेकिन ताकत नहीं थी। कुछ ही देर में मासी भी नंगी हो गईं। उनकी चूत साफ सूजी और लाल दिख रही थी। जाँघों के अंदरूनी हिस्से पर हल्के निशान थे। प्रिया ने एक बार देखकर कुछ नहीं कहा। बस मासी के बाल सहला दिए।
मैं अभी भी तैयार था। प्रिया को दोबारा अपनी तरफ खींच लिया।
तीसरा राउंड शुरू हो गया।
इस बार और जोर से। प्रिया को लिटाया, पैर फैलाए और बिना देर किए अंदर डाल दिया। ठोकरें तेज और गहरी थीं। प्रिया की कराहें फिर से निकलने लगीं। मैंने उसके हाथ सिर के ऊपर पकड़ लिए और लगातार पेलने लगा। स्तन मुँह में लिए, गर्दन काटी, कमर जोर से चलाई।
मासी बगल में नंगी लेटी सब देख रही थीं। उनकी आँखें खुली थीं। दर्द के बावजूद नज़र नहीं हटा रही थीं।
मैंने चालीस मिनट तक लगभग नॉन-स्टॉप मारा। पोजीशन थोड़ी-थोड़ी बदलता रहा, लेकिन रफ्तार कम नहीं की। प्रिया कभी कराहती, कभी मेरे बाल पकड़ती, कभी तकिए में मुँह दबा लेती। आखिर में वो एक बार फिर झड़ गईं। मैंने भी उसी राउंड में पानी छोड़ दिया।
तीनों थक चुके थे।
मैं बीच में लेट गया। एक तरफ प्रिया, दूसरी तरफ मासी। तीनों नंगे। कमरे में सिर्फ भारी साँसें गूँज रही थीं। लाइट्स अभी भी डिम थीं।
थोड़ी देर में तीनों सो गए।
सुबह के करीब पाँच बज रहे होंगे।
मुझे पानी की तलब हुई। उठा तो देखा—दोनों लड़कियाँ नंगी सो रही हैं। मासी एक तरफ, प्रिया दूसरी तरफ। बेड पर अभी भी हल्की गुलाबी रोशनी थी। दोनों के शरीर ढके नहीं थे। मासी की सूजी हुई चूत भी साफ दिख रही थी।
मेरा लंड तुरंत खड़ा हो गया।
मैंने प्रिया को हल्के से जगाया। वो आँखें रगड़ते हुए बोली, “क्या है किरण?”
“एक राउंड… प्लीज़।”
प्रिया ने मासी की तरफ देखा। फिर धीरे से बोली, “रुको… तुम्हारी मासी को भी। उनकी सूजी हुई है ना? कोई बात नहीं। तुम नींद में ही डाल दो… और बिना रुके करते रहना।”
मैंने मासी के करीब सरक गया। वो गहरी नींद में थीं। साँसें नियमित चल रही थीं। मैंने धीरे से उनके दोनों पैर ऊपर उठाए। घुटनों को मोड़कर छाती की तरफ दबाया। उनकी सूजी और लाल चूत खुल गई।
कंडोम पहना। लुब्रिकेंट जल्दी से लगाया। फिर लंड का सिरा रखा… और एक ही झटके में पूरा बारह इंच अंदर धकेल दिया।
मासी की आँखें फटी की फटी खुल गईं। मुँह से एक लंबी चीख निकलने ही वाली थी कि प्रिया ने झपटकर उनका मुँह अपने मुँह से ढक लिया। दोनों किस करने लगे। प्रिया मासी के होंठों को दबाए हुए थी ताकि आवाज़ न निकले।
मैंने तुरंत जोर-जोर से पेलना शुरू कर दिया। पूरा लंड हर बार बाहर निकलकर फिर जड़ तक अंदर चला जाता। मासी की सूजी हुई चूत बहुत टाइट थी। हर ठोकर पर उनका शरीर तड़प रहा था। आँखों में आँसू आ गए। वो प्रिया के होंठों के नीचे कराह रही थीं। हाथों से मेरी छाती धकेलने की कोशिश कर रही थीं, लेकिन ताकत नहीं थी।
“म्मम्म… म्मम्म…!” मासी की दबी चीखें निकल रही थीं।
मैंने उनके कूल्हे कसकर पकड़ लिए और रफ्तार बढ़ा दी। ठोकरें भारी और गहरी हो गईं। मासी की चूत में दर्द साफ था, लेकिन धीरे-धीरे उनकी कराहों में मजे का मिश्रण भी आने लगा। शरीर पहले तो अकड़ रहा था, फिर हल्के-हल्के हिलने लगा।
प्रिया लगातार उनका मुँह चूम रही थी। कभी जीभ अंदर डालती, कभी उनके स्तन मसलती। मासी की आँखों से आँसू बह रहे थे—दर्द और मजे दोनों के।
मैंने पचास मिनट तक लगभग नॉन-स्टॉप मारा। एक ही पोजीशन में। पैर ऊपर उठाए हुए। पूरा लंड हर बार अंदर जाता। मासी कभी तड़पती, कभी कमर हल्की उठाती। उनकी चूत अब गीली हो चुकी थी, लेकिन सूजन की वजह से अभी भी बहुत कस रही थी।
बीच में प्रिया ने मासी के कान में कुछ फुसफुसाया। मासी ने आँखें बंद कर लीं। उनकी कराहें अब ज्यादा लंबी होने लगीं। दर्द कम नहीं हुआ था, लेकिन मजा भी साफ आने लगा था।
पचास मिनट बाद मेरा शरीर अकड़ गया। गर्म वीर्य कंडोम में छूट गया। मैं उनके ऊपर गिर गया।
लंड अभी भी अंदर था। मासी जोर-जोर से हाँफ रही थीं। आँखें बंद। गाल आँसुओं से भीगे हुए। प्रिया ने उनका मुँह छोड़ा तो मासी की टूटी हुई आवाज़ निकली—
“किरण… बहुत दर्द… लेकिन… मजा भी आया…”
तीनों थककर वहीं बिस्तर पर गिरे रहे। सुबह की हल्की रोशनी कमरे में फैलने लगी थी।
उस सुबह के बाद हम तीनों और सात दिन रिसॉर्ट में रुके।
हर दिन कई राउंड होते। कमरे तक सीमित नहीं रहे।
जैकुज़ी में गरम पानी के बीच, बालकनी की ठंडी हवा में, बाथरूम के शीशे के सामने, सोफे पर, नीचे लॉन में, बगीचे के कोने में, और एक रात स्विमिंग पूल के किनारे भी। कभी सिर्फ मासी के साथ, कभी प्रिया के साथ, कभी तीनों मिलकर।
मासी की सूजन धीरे-धीरे कम हुई। दर्द जाता रहा और उसकी जगह भूख ने ले ली। वो खुद नए-नए जगह सुझाने लगीं। कभी बालकनी की रेलिंग पकड़कर खड़ी हो जातीं, कभी जैकुज़ी के किनारे बैठ जातीं। उनकी शर्म पूरी तरह टूट चुकी थी।
सात दिनों में मैंने उन्हें वो सब दिया जो उनकी जवानी में रह गया था। पहली बार का दर्द, फिर मजा, फिर और मजा। रात-दिन का फर्क मिट गया था। कभी सुबह जल्दी, कभी दोपहर की झपकी में, कभी देर रात।
प्रिया भी साथ रही। कभी मदद करती, कभी खुद लेती, कभी सिर्फ देखती। तीनों का एक अनोखा संतुलन बन गया था।
आखिरी दिन पैकिंग करते समय मासी चुप थीं। चेहरे पर थकान थी, लेकिन आँखों में संतुष्टि भी थी। जाते-जाते उन्होंने सिर्फ इतना कहा, “धन्यवाद किरण… तुमने मेरी जवानी के मजे पूरे कर दिए।”
हम रिसॉर्ट से निकले।
दस दिन पूरे हुए।
वापस अपनी-अपनी जिंदगी में चले गए।
कोई बड़ा वादा नहीं हुआ।
कोई पछतावा भी नहीं।
सिर्फ वो दस दिन…
जो तीनों के पास यादों में रह गए।
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