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लव स्टोरी

फार्महाउस की दो रातें 3

· Online Admin

सुबह की पहली किरणें पर्दे की दरार से कमरे में घुस रही थीं। मैंने आँखें खोलीं तो वो मेरे सीने पर ही सोई हुई थी। एक टाँग मेरे ऊपर चढ़ी हुई थी, बाल बिखरे हुए, होंठ थोड़े सूजे हुए। रात भर की मेहनत के निशान उसके शरीर पर साफ दिख रहे थे – गर्दन पर हल्के काटने के निशान, स्तनों पर मेरे दाँतों के निशान, जाँघों के अंदर लालिमा।

मैंने धीरे से उसके बाल हटाए और माथे पर किस किया। वो मुड़ी और आँखें खोलीं।

“सुबह हो गई?” उसने कर्कश आवाज़ में पूछा।

“हम्म… नौ बज रहे हैं।”

वो मेरे और करीब सट गई। उसका हाथ सीधे मेरे लंड पर चला गया। सुबह-सुबह ही वो आधा सख्त था। उसके स्पर्श से पूरी तरह खड़ा हो गया।

“फिर से?” मैंने मुस्कुराते हुए पूछा।

“थोड़ा सा…” उसने फुसफुसाया और मेरे ऊपर चढ़ गई।

इस बार बिना कंडोम के शुरुआत की। सिर्फ बाहर से रगड़ने लगी। उसके गीले होंठ मेरे लंड पर सरक रहे थे। मैंने उसके कूल्हे पकड़कर नीचे दबाए। फिर धीरे से कंडोम पहनाया। उसने खुद लुब्रिकेंट लगाई और बैठ गई। सुबह की पहली एंट्री चिकनी और गहरी थी। वो धीरे-धीरे ऊपर-नीचे होने लगी। आँखें बंद, होंठ खुले।

मैंने उसके स्तनों को पकड़कर जोर से मसला। सुबह की रोशनी में उसका शरीर और भी खूबसूरत लग रहा था। पसीना फिर से चमकने लगा। लगभग दस मिनट बाद वो काँप उठी। मैंने भी उसी के साथ छोड़ दिया।

दोनों बिस्तर पर गिरे पड़े रहे। फिर उसने कहा, “नहा लें… भूख भी लग रही है।”

हम दोनों उठे। बाथरूम में जाकर एक साथ शावर के नीचे खड़े हो गए। गर्म पानी शरीर पर गिर रहा था। मैंने उसके बाल धोए, पीठ पर साबुन लगाया, फिर आगे बढ़कर उसके स्तनों और नीचे तक साफ किया। उसने भी मेरे शरीर पर हाथ फेरे। शावर के नीचे ही मैंने उसे दीवार से लगा दिया और फिर से सख्त होते हुए महसूस किया। लेकिन इस बार सिर्फ उंगलियों और मुँह से काम चलाया। कंडोम नहीं लगाया। वो मेरे कंधे पर सिर रखकर कराहती रही जब तक दूसरी बार नहीं आ गई।

नहाकर हमने आराम के कपड़े पहने। मैंने सिर्फ ट्रैक पैंट, उसने मेरी ही बड़ी टी-शर्ट। नीचे कुछ नहीं।

किचन में कुक ने नाश्ता तैयार रखा था – ऑमलेट, टोस्ट, फ्रूट्स, कॉफी। हम दोनों टेबल पर बैठे। कुक ने प्लेट्स लगाईं और चुपचाप पीछे चला गया। हमने खाना खाया। बीच-बीच में उसके पैर मेरे पैर से छू रहे थे। एक बार मैंने टेबल के नीचे हाथ बढ़ाकर उसकी जाँघ सहलाई। उसने आँखें तरेर कर देखी लेकिन मुस्कुरा दी।

नाश्ता खत्म करने के बाद मैंने कहा, “पूल में चलें?”

उसकी आँखें चमक उठीं। “हाँ।”

हमने स्विमिंग कॉस्ट्यूम पहने – उसने ब्लैक बिकिनी, मैंने शॉर्ट्स। बाहर धूप अच्छी थी। पूल का पानी ठंडा और साफ। हम दोनों पानी में कूदे। पहले थोड़ी देर तैरते रहे, पानी के अंदर एक-दूसरे को पकड़ते रहे। फिर मैंने उसे पूल के किनारे वाले छोटे स्टेप्स पर बिठाया। पानी कमर तक था।

मैं उसके सामने खड़ा हुआ। उसने मेरे शॉर्ट्स नीचे किए। पानी के अंदर ही उसने मुझे मुँह में ले लिया। ठंडे पानी और उसके गर्म मुँह का कॉन्ट्रास्ट पागल कर रहा था। मैंने उसके बाल पकड़ रखे थे। वो धीरे-धीरे गहराई तक ले जा रही थी। कभी-कभी पानी की सतह के ऊपर आती तो साँस लेती और फिर से डुबकी लगाती।

थोड़ी देर बाद मैंने उसे उठाया। बिकिनी का टॉप खींचकर उसके स्तन बाहर निकाल दिए। पानी के अंदर ही बॉटम साइड में करके एंट्री कर ली। इस बार कंडोम नहीं था – पूल में मुश्किल था। मैंने बाहर ही रगड़ते हुए मूव किया। फिर धीरे से अंदर धकेला। पानी के दबाव और उसके अंदर की गर्माहट ने पागल कर दिया। मैंने उसके कूल्हे पकड़कर जोर-जोर से पेलना शुरू किया। पानी छलक रहा था। उसकी कराहें पूल के आसपास गूँज रही थीं।

“कोई देख तो नहीं रहा?” उसने बीच में पूछा।

“कुक अंदर है… और यहाँ कोई नहीं आता,” मैंने जवाब दिया और और तेज़ कर दिया।

पूल के किनारे हमने लगभग बीस मिनट बिताए। आखिर में मैंने बाहर निकालकर उसके पेट पर छोड़ दिया। पानी ने सब धो दिया।

उसके बाद हम पूल के किनारे तौलिये बिछाकर लेट गए। धूप सेंकते हुए उसके शरीर पर तेल लगाया। पीठ से शुरू करके, कमर, जाँघें, फिर पलटकर स्तनों और पेट पर। तेल लगाते-लगाते मेरा हाथ फिर नीचे पहुँच गया। उसने पैर फैला दिए। मैंने उंगलियों से खेलना शुरू किया। धूप में लेटे-लेटे वो फिर से आ गई। इस बार धीमी और लंबी।

दोपहर हो गई थी। हम अंदर आए। भूख लगी थी। कुक ने लंच तैयार रखा था। खाना खाते समय उसके चेहरे पर वो वाली चमक थी – संतुष्ट लेकिन अभी भी भूखी।

लंच के बाद मैंने उसे टेरेस पर ले गया। ऊपर खुली जगह, हल्की हवा। मैंने एक बड़ी कुर्सी बिछाई। उसे बैठाया और खुद सामने खड़ा हो गया। उसने फिर से मुझे मुँह में लिया। इस बार और आराम से, और गहराई तक। मैंने उसके बाल पकड़कर धीरे-धीरे मूव किया। जब लगभग पहुँचने वाला था तो निकाला और उसे कुर्सी पर लिटा दिया। कंडोम पहना, लुब्रिकेंट लगाया और मिशनरी में शुरू कर दिया। टेरेस पर हवा चल

रही थी। उसके बाल बिखर रहे थे। हर धक्के के साथ कुर्सी हिल रही थी।

हमने वहाँ दो राउंड किए। एक मिशनरी में, दूसरा उसने ऊपर बैठकर।

शाम होने से पहले हम गार्डन में चले गए। पेड़ों की छँव में एक झूला था। मैंने उसे झूले पर बैठाया। उसके सामने खड़ा होकर शॉर्ट्स नीचे किए। उसने दोनों हाथों से पकड़कर मुँह में ले लिया। झूला हल्के-हल्के हिल रहा था। मैंने उसके मुँह में ही छोड़ दिया। उसने सब निगल लिया।

फिर मैंने उसे झूले पर ही लिटाया। पैर फैलाए और कंडोम पहनकर एंट्री की। झूला हर धक्के के साथ आगे-पीछे हो रहा था। उसकी आवाज़ें बाग में गूँज रही थीं। पेड़ों के पत्ते हिल रहे थे। हम दोनों पसीने से तर हो चुके थे।

शाम के लगभग छह बज गए थे जब हम वापस अंदर आए। शरीर थक चुका था लेकिन मन अभी भी और मांग रहा था।

मैंने उसे जकूज़ी में ले जाने का फैसला किया। गर्म पानी भरवाया, बबल्स ऑन किए। दोनों नंगे उतर गए। गर्म पानी में शरीर ढीला पड़ गया। मैंने उसे अपनी गोद में बिठाया। पीछे से उसके स्तन सहलाए, गर्दन चूमी। फिर धीरे से एंट्री की। जकूज़ी के पानी में मूवमेंट चिकना और गहरा था। बबल्स हमारे चारों ओर फूट रहे थे। उसने सिर पीछे मेरी तरफ किया और किस करने लगी। मैंने उसके क्लिट को उंगलियों से सहलाते हुए पेलना जारी रखा।

जकूज़ी में हमने लगभग आधा घंटा बिताया। दो बार पहुँचे। पानी गंदला हो चुका था।

रात होने वाली थी। हम दोनों तौलिये से पोंछकर बेडरूम में आए। बिस्तर पर गिरे। शरीर में दर्द भी था, मज़ा भी। उसने मेरी तरफ देखा और कहा, “आज दिन भर में कितनी बार हो गया?”

मैंने गिना। “सुबह बेड पर एक, शावर में एक, पूल में एक, टेरेस पर दो, गार्डन में एक, जकूज़ी में दो… लगभग आठ।”

वो हँस पड़ी। “कल और बचा है… रात भी बाकी है।”

मैंने उसे बाँहों में भर लिया। बाहर अँधेरा हो रहा था। फार्महाउस की दूसरी शाम शुरू होने वाली थी। लेकिन दिन के सारे सीन्स अभी भी शरीर पर महसूस हो रहे थे – पूल का ठंडा पानी, टेरेस की हवा, गार्डन की मिट्टी की खुशबू, जकूज़ी की गर्माहट।

मैंने उसके माथे पर किस किया। “रात को और लंबा करेंगे।”

उसने आँखें बंद कर लीं। मुस्कान होंठों पर थी।

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