पेरिस में वर्जिन दोस्त और सौतेली माँ की चुदाई 3
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उस दिन और रात मैंने आस्था को कई बार पेला।
पहली बार के बाद थोड़ी देर आराम किया। फिर दोबारा कॉन्डम लगाकर उसे मिशनरी में लिटाया और जोर-जोर से चोदा। आस्था की चूत अभी भी टाइट थी, हर धक्के पर वह सिसकती और कभी-कभी चीख भी जाती। बीस-पच्चीस मिनट बाद मैंने फिर उसके मुँह में झड़ने से पहले निकाल लिया और कॉन्डम उतारकर उसके चेहरे और बूब्स पर छोड़ दिया।
शाम को तीसरी बार घोड़ी बनाकर पीछे से मारा। इस बार थोड़ा और देर तक। आस्था की गांड पर थप्पड़ भी लगाए। वह रोती-सिसकती रही लेकिन मना नहीं किया। रात को सोने से पहले चौथी बार। इस बार मैंने उसके दोनों पैर अपने कंधों पर रखे और पूरा वजन डालकर पेलता रहा। आस्था की आँखों से आँसू आ गए थे दर्द से, लेकिन वह सहती रही। आखिर में मैंने कॉन्डम के अंदर ही झड़ दिया।
रात भर में बीच-बीच में और दो-तीन बार हल्के-फुल्के राउंड हो गए। सुबह तक आस्था की चूत पूरी तरह सूज चुकी थी, लाल और संवेदनशील। वह चलते समय थोड़ा लड़खड़ा रही थी।
मैंने उसे पूरे चौबीस घंटे का आराम दे दिया। कोई छुआछूत नहीं। सिर्फ दवाइयाँ और आराम। अगले दिन शाम तक उसकी सूजन काफी कम हो गई थी। चूत अभी भी थोड़ी संवेदनशील थी लेकिन पहले जैसी हालत नहीं रही।
फिर हम दोनों थोड़ा बाहर घूमने निकले। पेरिस के एक बड़े मॉल में गए। शॉपिंग की – कपड़े, परफ्यूम, कुछ छोटी-मोटी चीज़ें। आस्था खुश लग रही थी।
वहीं पर मैंने एक शॉप से कॉन्डम का नया पैकेट और एक अच्छा लुब्रिकेंट ले लिया। आस्था ने पूछा,
“यह क्यों ले रहे हो? मुझे जरूरत नहीं है।”
मैंने मुस्कुराते हुए कहा,
“बाद में पता चल जाएगा।”
आस्था ने एक महँगी घड़ी भी ले ली – डायमंड वाली, काफी कीमत की। वह मेरी तरफ देखकर बोली,
“इतना किया है तो यही लूँगी ना?”
मैंने कुछ नहीं कहा। बस मुस्कुरा दिया। घड़ी उसके हाथ में बंधवा दी।
रूम वापस आए। दोनों नंगे हो गए और बिस्तर पर लेट गए। मैंने उसे अपनी बाहों में लिया, लंबे समय तक किस किया – गालों पर, गर्दन पर, होंठों पर। लेकिन और कुछ नहीं किया। सिर्फ प्यार भरा किस और बाहें। आस्था भी शांत पड़ी रही।
फिर दोनों ने डिनर किया। रूम सर्विस से बढ़िया फ्रेंच खाना मँगवाया। खाते समय आस्था की नज़र बार-बार मेरे तने हुए लंड पर जाती रही, लेकिन मैंने उस दिन और कुछ नहीं किया।
सुबह करीब तीन बजे मेरी नींद खुल गई।
कमरे में अँधेरा था। आस्था मेरे बगल में गहरी नींद सो रही थी। मैं उठा। कॉन्डम निकाला और अपने पहले से तने हुए लंड पर चढ़ा दिया। फिर लुब्रिकेंट की बोतल खोली और खूब सारा लुब्रिकेंट अपने लंड पर और आस्था की गांड के छेद पर लगा दिया। ठंडा जेल लगते ही आस्था थोड़ी हिली।
मैंने उसे जगाते हुए कहा,
“चल अब तैयार हो जा… डॉगी पोजीशन में हो जा।”
आस्था नींद में बोली,
“ऐसे ही मार लो ना… मुझे नींद आ रही है…”
मैंने दोबारा कहा,
“डॉगी पोजीशन में हो जा तुम… मुझे गांड मारनी है तुम्हारी।”
आस्था की आँखें अचानक खुल गईं। वह उठकर बैठ गई और जोर से बोली,
“नहीं रोहित! क्यों? मुझे नहीं मरवानी गांड! कितना दर्द होता है तुझे पता है? तुम्हारी मम्मी की 59 साल की उम्र में मारी थी तो भी वह नहीं सह पाई थी… तो मेरा क्या होगा? तुम्हारा कितना मोटा है… नहीं… मुझे नहीं मरवानी… मुझे कुछ नहीं चाहिए… सब ले लो तुम… तुम्हारे पापा को बोल दूँगी!”
मैंने शांत स्वर में कहा,
“कौन बोलोगे कि नेकलेस के लिए मम्मी मेरे साथ सोई?”
आस्था कुछ देर चुप रही। फिर धीरे से मुस्कुराई और बोली,
“मैं मजाक कर रही हूँ… तुम ही जो करना है वो करो…”
आस्था चारों पर थी। तकिया पेट के नीचे दबा हुआ। गांड ऊपर उठी हुई। मैंने खूब लुब्रिकेंट लगा रखा था। लंड का सुपाड़ा उसके गांड के छेद पर रखा और एक जोर का धक्का मारा।
सुपाड़ा अंदर घुसा।
आस्था अचानक जोर से तड़प उठी। पूरा बदन अकड़ गया।
“उई माँ… बचाओ… फट गई… मर गई… निकालो ना… बहुत जल रहा है…” वह चिल्लाते हुए जोर-जोर से रोने लगी। आँसू तुरंत निकल आए। उसने चादर को दोनों हाथों से जकड़ लिया और सिर इधर-उधर पटकने लगी।
मैंने दूसरा धक्का मारा। आधा लंड अंदर धंस गया।
आस्था और बेकाबू होकर तड़पने लगी। पैर लड़खड़ा रहे थे। वह आगे सरकने की कोशिश कर रही थी।
“उई माँ… बचाओ… फट गई… मर गई… निकालो ना… बहुत जल रहा है… रोहित निकालो… बहुत जल रहा है अंदर…” वह जोर-जोर से रो रही थी। आवाज़ फट रही थी। गांड की मांसपेशियाँ मेरे मोटे लंड को धकेलने की पूरी कोशिश कर रही थीं। पहली बार इतना मोटा और लंबा लंड जाने से अंदर जलन और खिंचाव इतना तेज़ था कि उसका पूरा निचला हिस्सा काँप रहा था।
तीसरा धक्का। पूरा 12 इंच मोटा लंड एक झटके में उसकी गांड में समा गया।
आस्था की चीख इस बार और तेज़ निकली। वह बिस्तर पर सिर पटकने लगी।
“उई माँ… बचाओ… फट गई… मर गई… निकालो ना… बहुत जल रहा है… पूरा अंदर चला गया… फट गई मैं… बचाओ…” वह फुट-फुट कर रो रही थी। आँसू और सिसकियों से चेहरा भीग चुका था। पहली बार इतने मोटे लंड के पूरी तरह अंदर जाने से गांड में जलन, खिंचाव और दबाव इतना था कि वह साँस भी ठीक से नहीं ले पा रही थी। बदन झटके खा रहा था।
मैंने कमर पकड़कर धक्के शुरू कर दिए। पूरा लंड बाहर निकालकर फिर अंत तक पेलना।
हर धक्के पर आस्था जोर से तड़पती और चिल्लाती।
“उई माँ… बचाओ… फट गई… मर गई… निकालो ना… बहुत जल रहा है… बहुत अंदर जा रहा है… सह नहीं पा रही…” वह लगातार रो रही थी। कभी चादर दाँतों से पकड़ लेती, कभी मेरे हाथ को धकेलने की कोशिश करती। गांड लाल हो रही थी। हर धक्के के साथ अंदर जलन बढ़ रही थी। पहली बार इतने मोटे लंड से गांड फैलने का दर्द इतना तेज़ था कि उसकी चूत भी सिकुड़-सिकुड़ जाती थी।
मैंने स्पीड बढ़ा दी। जोर-जोर से पेलने लगा।
आस्था अब पूरी तरह बेकाबू थी। जोर-जोर से रोना, तड़पना, सिर पटकना।
“उई माँ… बचाओ… फट गई… मर गई… निकालो ना… बहुत जल रहा है… रोहित प्लीज… बहुत जल रहा है… निकाल दो…” वह बार-बार यही दोहरा रही थी। आवाज़ बैठने लगी थी लेकिन रोना रुक नहीं रहा था। पसीना पूरे बदन पर आ गया था। गांड की फलियाँ तनकर लाल हो चुकी थीं। हर धक्के पर वह काँपती और आगे को भागने की कोशिश करती।
मैंने उसकी चोटी पकड़कर पीछे खींच ली। आस्था का सिर उठ गया। वह और जोर से रोने लगी।
“उई माँ… बचाओ… फट गई… मर गई… निकालो ना… बहुत जल रहा है… बहुत मोटा है… फट गई मैं…” आँसू उसकी आँखों से बह रहे थे। मुँह खुला हुआ था। पहली बार 12 इंच के मोटे लंड से गांड की चुदाई का दर्द उसके पूरे शरीर में फैल चुका था। वह बस तड़प रही थी और रो रही थी।
मैंने करीब पच्चीस-तीस मिनट तक इसी तरह जोर-जोर से पेलता रहा। आस्था की हालत खराब होती जा रही थी। रोना कमजोर पड़ने लगा था लेकिन तड़पना जारी था। गांड पूरी तरह सूज चुकी थी। वह बिस्तर पर मुँह गड़ाए हुए काँप रही थी और बीच-बीच में कमजोर आवाज़ में दोहरा रही थी,
“उई माँ… बचाओ… फट गई… निकालो ना… बहुत जल रहा है…”
आखिर में मैंने तेज़ धक्के मारे और कॉन्डम के अंदर ही झड़ गया। लंड अंदर दबाए रखा।
जब बाहर निकाला तो आस्था बिस्तर पर ढेर हो गई। जोर-जोर से साँसें ले रही थी। रोना अभी भी जारी था। गांड खुली, लाल और सूजी हुई थी। वह देर तक तड़पती और रोती रही। बोलने की हालत में नहीं थी। बस सिसकियाँ और कभी-कभी कमजोर आवाज़ में “बहुत जल रहा है…” निकल रहा था।
मैं उसके बगल में लेट गया। आस्था की साँसें धीरे-धीरे काबू में आ रही थीं लेकिन आँखों से आँसू अभी भी बह रहे थे।
आस्था बिस्तर पर मुँह के बल गिरी हुई थी। जोर-जोर से साँसें ले रही थी। रोना अभी भी जारी था।
मैंने उसकी गांड को ध्यान से देखा। पूरा छेद फट चुका था। एक मोटा, खुला हुआ छेद दिख रहा था – लाल-लाल, सूजा हुआ। लुब्रिकेंट और हल्के खून के निशान भी थे। गांड की फलियाँ तनकर लाल हो चुकी थीं। वह तड़प रही थी।
बिना कोई आराम दिए मैंने कॉन्डम उतार दिया। लंड अभी भी पूरा तना हुआ था। मैंने आस्था को घुमाया। वह कमजोर आवाज़ में बोलने लगी,
“रोहित… प्लीज… रुक जाओ… डर लग रहा है… प्लीज… अब मत करो… गांड फट गई है… बहुत जल रहा है…”
मैंने उसके पैर फैलाए। सुपाड़ा उसकी चूत पर रखा। वह और जोर से तड़पने लगी।
“उई माँ… बचाओ… प्लीज रुक जाओ… डर लग रहा है… निकालो… मत डालो… प्लीज…” वह जोर-जोर से रोने लगी। आँसू बह रहे थे। उसने मेरे सीने पर हाथ रखकर धकेलने की कोशिश की लेकिन ताकत नहीं थी।
मैं रुका नहीं। एक जोर का धक्का मारा। आधा लंड उसकी चूत में घुस गया।
आस्था जोर से चिल्लाई और तड़प उठी।
“उई माँ… बचाओ… फट गई… मर गई… निकालो ना… बहुत जल रहा है… प्लीज रुक जाओ…” वह फुट-फुट कर रो रही थी। बदन काँप रहा था।
मैंने दूसरा धक्का मारा। पूरा लंड अंदर चला गया। बिना कॉन्डम के। उसकी चूत मेरे मोटे लंड से पूरी तरह फैल गई।
आस्था और बेकाबू होकर रोने लगी। जोर-जोर से तड़प रही थी। सिर इधर-उधर पटक रही थी।
“उई माँ… बचाओ… फट गई… मर गई… निकालो ना… बहुत जल रहा है… प्लीज रुक जाओ… डर लग रहा है…” वह बार-बार यही दोहरा रही थी। आवाज़ फट रही थी।
मैंने धक्के शुरू कर दिए। पूरा लंड बाहर निकालकर फिर अंत तक पेलना। जोर-जोर से। हर धक्के पर आस्था तड़पती और रोती। कभी चादर पकड़ती, कभी मेरे हाथ धकेलने की कोशिश करती। गांड का दर्द और चूत का दर्द दोनों मिलकर उसे पागल कर रहे थे। पूरा निचला हिस्सा जल रहा था।
मैंने स्पीड बढ़ा दी। तेज़-तेज़ पेलने लगा। आस्था की चीखें कमरे में गूँज रही थीं। वह जोर-जोर से रो रही थी, तड़प रही थी। आँखें बंद, मुँह खुला, आँसू बहते हुए।
“उई माँ… बचाओ… फट गई… मर गई… निकालो ना… बहुत जल रहा है… प्लीज रुक जाओ…” वह बार-बार चिल्ला रही थी। आवाज़ धीरे-धीरे बैठने लगी थी लेकिन रोना रुक नहीं रहा था।
मैंने पोजीशन बदली। उसे घोड़ी बनाया। पीछे से चूत में लंड डालकर जोर-जोर से पेलने लगा। आस्था और तड़पने लगी। सिर चादर में घुसा दिया था। जोर-जोर से सिसकियाँ ले रही थी।
फिर मिशनरी में लिटाया। दोनों पैर अपने कंधों पर रखे और पूरा वजन डालकर पेलता रहा। आस्था की हालत खराब होती जा रही थी। रोना कमजोर पड़ रहा था लेकिन तड़पना जारी था। बदन पसीने से तरबतर हो चुका था।
समय बीतता गया। चार बजे… पाँच बजे… मैं बिना रुके चोदता रहा। आस्था कभी जोर से रोती, कभी बस सिसकियाँ लेती। बीच-बीच में कमजोर आवाज़ में दोहराती,
“उई माँ… बचाओ… निकालो ना… बहुत जल रहा है… प्लीज रुक जाओ…”
करीब साढ़े पाँच बजे तक मैंने लगभग ढाई घंटे लगातार चोदा। आस्था की चूत पूरी तरह सूज चुकी थी, लाल और खुली हुई। वह अब बस बिस्तर पर काँप रही थी। रोना लगभग रुक चुका था। सिर्फ हल्की सिसकियाँ निकल रही थीं।
छह बजे के करीब मैंने आखिरी तेज़ धक्के मारे और उसकी चूत के अंदर ही झड़ गया। गरम-गरम वीर्य की धार उसकी कोख में भर गई। मैंने लंड अंदर ही दबाए रखा। दो-तीन मिनट तक।
जब बाहर निकाला तो वीर्य उसकी सूजी हुई चूत से बाहर निकलने लगा। आस्था बिस्तर पर ढेर पड़ी थी। आँखें बंद। साँसें उखड़ी हुईं। पूरा बदन काँप रहा था।
मैं उसके बगल में थककर लेट गया और धीरे से बोला,
“अब आराम कर… चौबीस घंटे… फिर करेंगे।”
आस्था ने कुछ नहीं कहा। सिर्फ सिसकियाँ ले रही थी। आँखों से अभी भी हल्के आँसू बह रहे थे।
मैं थककर सो गया था।
करीब एक घंटे बाद अचानक आस्था ने मुझे जगाया। वह जोर-जोर से रो रही थी। आँखें सूजी हुईं, गाला लाल।
“यह तुमने क्या किया… रोहित… बिना कॉन्डम के क्यों किया… मेरे प्रेग्नेंट होने के दिन चल रहे थे… अभी चूत पर हाथ लगाया तब पता चला… रोते हुए दर्द में मुझे कुछ पता ही नहीं चला…”
वह और जोर से रोने लगी। आवाज़ फट रही थी।
“अब क्या करूँ रोहित… तेरे पापा को पता चल जाएगा… मेरा क्या होगा… तुम कितने गंदे हो… तुमने ऐसा क्यों किया…” वह फुट-फुट कर रो रही थी। बिस्तर पर बैठकर सिर पकड़े हुए काँप रही थी।
मैंने उठकर उसके बाल सहलाए और शांत स्वर में कहा,
“कोई बात नहीं… टैबलेट ला दूँगा… नहीं होगी।”
आस्था ने सिर जोर से हिलाया। आँसू पोंछते हुए बोली,
“मुझे टैबलेट यूज नहीं करनी… मैं नहीं लूँगी…”
फिर वह देर तक रोती रही। कभी मेरा हाथ पकड़ती, कभी अपना मुँह छुपा लेती। गांड और चूत दोनों जगह की जलन अभी भी उसे परेशान कर रही थी।
थोड़ी देर बाद मैंने कहा,
“एक काम करो… फ्लाइट बुक करो… कल घर चली जाओ… और पापा के साथ बिना कॉन्डम के सेक्स कर लो।”
आस्था ने आँखें उठाकर देखा। थोड़ी देर चुप रही, फिर धीरे से बोली,
“गांड सूजी पड़ी है… और मैं सेक्स कैसे करूँगी… थिक हो जाएगी फिर…”
मैंने सिर हिलाया।
“हो जाएगी। तू चली जा।”
उस दिन ही मैंने आस्था की फ्लाइट बुक कर दी – अगले दिन सुबह की। नेहा की फ्लाइट दो दिन बाद की रखी। नेहा अभी भी रिकवर हो रही थी, नर्स उसके साथ थी।
अगले दिन आस्था निकल गई। मैं और नेहा दो दिन बाद भारत पहुँचे।
घर आकर आस्था ने पापा के साथ रात बिताई। अगले दिन सुबह उसने मुझे अलग से मिलकर धीरे से कहा,
“काम हो गया।”
एक महीने बाद आस्था ने सबको गुड न्यूज दी। घर में खुशी छा गई। पापा बहुत खुश थे। किसी को कुछ शक नहीं हुआ।
मैंने नेहा को एक नई कार गिफ्ट कर दी – जैसी उसने माँगी थी। नेहा ने कार ले ली, लेकिन उसके बाद मुझसे कभी आँख मिलाकर बात नहीं की। वह कॉलेज वापस चली गई।
आस्था के पेट में बच्चा बढ़ने लगा। घर में सब खुश थे।
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