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सुहागरात और हनीमून

दीदी की शादी और सुहागरात 4

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दीदी मेरे कमरे में बिस्तर पर बैठी हुई थी। दरवाजा बंद था। घर में बाकी लोग सोने की तैयारी कर रहे थे। थोड़ी देर तक दोनों चुपचाप बैठे रहे। फिर मैंने धीमी आवाज में पूछा,

“हनीमून कैसा रहा?”

दीदी ने मेरी तरफ देखा। उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान आई, लेकिन वो खुलकर कुछ नहीं बोली। उसने नज़रें झुका लीं और चादर के किनारे से खेलने लगी। थोड़ी देर बाद बोली,

“अच्छा रहा… बहुत घूमे। समुद्र किनारे का कमरा था। मौसम भी सुहावना था।”

मैंने फिर पूछा, “बस इतना ही? और कुछ नहीं?”

दीदी ने साँस छोड़ते हुए कहा, “मजे तो बहुत किए… लेकिन सब नहीं बताया जाता।”

उसकी आवाज में हल्की शर्म और थोड़ी सी खुशी दोनों थे। वो खुलकर डिटेल में नहीं जा रही थी, बस इशारों में बता रही थी कि हनीमून सिर्फ घूमने का नहीं था। रातें भी काफी सक्रिय रही होंगी। मैंने और जोर नहीं डाला। थोड़ी देर खामोशी रही। फिर मैंने धीमे से पूछा,

“उस दराज में जो चीजें दिखी थीं… वो तुम इस्तेमाल करती हो?”

दीदी की आँखें थोड़ी बड़ी हो गईं। उसने मेरी तरफ देखा और फिर नज़रें फेर लीं। कुछ पल चुप रही। फिर बहुत धीमी आवाज में बोली,

“हाँ… किया है। चार-पाँच बार। मजे आए हैं… काफी।”

मेरा दिल थोड़ा तेज धड़कने लगा। मैंने और पूछ लिया,
“अकेले… या जीजू के साथ?”

दीदी ने अचानक मेरी तरफ देखा। उसके चेहरे पर अब हल्की झुंझलाहट थी। उसने चादर खींचते हुए कहा,

“अब तुम्हारी ज्यादा हो रही है। इतने सवाल मत पूछो। चुपचाप सो जाओ।”

उसकी आवाज में नाराजगी से ज्यादा शर्म थी। वो और कुछ नहीं बताना चाहती थी। मैं समझ गई कि सीमा पार हो गई है। मैंने सिर हिलाया और बोला, “ठीक है… सो जाती हूँ।”

दीदी ने भी करवट ली। दोनों बिस्तर पर लेट गए। कमरे में सिर्फ पंखे की आवाज रह गई। दीदी ने अपनी तरफ से बात खत्म कर दी थी। हनीमून के बारे में जितना उसने इशारों में कहा, उतना ही काफी था। बाकी सब अनकहा रह गया।

मैंने आँखें बंद कर लीं। लेकिन मन में कई सवाल घूम रहे थे। दीदी अब बदल चुकी थी। एक महीने पहले जो शर्मीली दीदी थी, अब वो हनीमून और उन चीजों के बारे में हल्के इशारों में बात कर रही थी। धीरे-धीरे थकान ने मुझे भी जकड़ लिया। दोनों बहनें एक ही कमरे में सो गईं। घर फिर से शांत हो गया।

 

दीदी लगभग पंद्रह दिन हमारे घर रुकी रहीं। उन दिनों वो अक्सर जीजू से फोन पर बात करतीं। कभी-कभी बात करते हुए उनकी आवाज में हल्की सी अधीरता साफ झलकती। एक दिन मैंने सुना वो कह रही थीं, “बहुत याद आ रही है… यहाँ सब ठीक है लेकिन तुम नहीं हो तो अजीब लगता है।” जीजू दूसरी तरफ से कुछ कह रहे होंगे, क्योंकि दीदी कभी मुस्कुरा देतीं तो कभी शर्म से आवाज दबा लेतीं।

एक दिन की बात है। दीदी बाथरूम में नहाने गईं। दरवाजा बंद था लेकिन अंदर से उनकी आवाज आ रही थी। लग रहा था वो वीडियो कॉल पर हैं। पानी की आवाज के बीच-बीच में उनकी हल्की हँसी और धीमी बातें सुनाई दे रही थीं। मैं ज्यादा देर वहाँ नहीं रुकी।

एक और दिन मम्मी और दीदी किचन में बात कर रहे थे। मैं पास से गुजरी तो मम्मी की आवाज सुनाई दी, “बिना कंडोम के अभी मत करना। अभी मजे करने हैं, जल्दबाजी की क्या जरूरत।” दीदी ने हल्के में जवाब दिया, “हाँ मम्मी… अभी वैसा नहीं करती।” बात यहीं खत्म हो गई।

बीस दिन बीत चुके थे। जीजू काम से बाहर गए हुए थे। बाईसवें दिन सुबह दीदी ने मुझसे कहा, “चल, आज पार्लर जाके आते हैं। थोड़ी-बहुत शॉपिंग भी कर लेंगे। कल मैं अपने घर जाने वाली हूँ।”

हम दोनों एक्टिवा पर निकले। दीदी चला रही थी। रास्ते में उसका फोन बज उठा। जीजू का कॉल था। दीदी ने फोन लगाया और बात करने लगी। हेलमेट की वजह से सब कुछ साफ नहीं सुनाई दे रहा था, लेकिन कुछ टुकड़े मेरे कानों तक आ गए।

जीजू कह रहे थे, “…अपनी चूत साफ करवा लेना… शाम को आऊँगा।”
दीदी ने जवाब दिया, “वही करवाने आई हूँ… मुझे भी बहुत तड़प हो रही है… तुम भी साफ-सफाई करके आना… फिर मजे आएंगे।”

थोड़ी देर बाद दीदी ने आवाज और धीमी करते हुए कहा, “कंडोम लेते आना… मैं बहन के साथ आई हूँ, नहीं ले पाऊँगी।”

मैंने सुना लेकिन कुछ नहीं बोला। हम एक बड़े पार्लर पहुँचे। दीदी ने अपना नाम बताया और एक रूम में चली गई। उसने मुझे भी साथ ले लिया। अंदर जाकर दीदी ने धीरे-धीरे सारे कपड़े उतार दिए। अब वो सिर्फ पैंटी में रह गई थी। मैंने नोटिस किया कि उसके स्तन पहले से थोड़े भरे और बड़े लग रहे थे। दीदी ने बिस्तर पर लेटते हुए मुझसे कहा, “तुम बाहर बाजू में बैठो।”

वो नहीं चाहती थी कि मैं आगे का हिस्सा देखूँ। पार्लर वाली आ गई और दीदी की वैक्सिंग शुरू हो गई। मैं बाहर ही बैठी रही। काफी देर बाद दीदी बाहर आई। चेहरा थोड़ा लाल था। कपड़े पहनते हुए उसने धीमी आवाज में कहा, “तुम्हारे जीजू को बिना साफ-सफाई के पसंद नहीं आता।” फिर वो चुप हो गई। मैंने भी कुछ नहीं पूछा।

थोड़ी शॉपिंग करके हम घर लौटे। शाम हो चुकी थी। घर में मम्मी ने जीजू की पसंदीदा चीजें बना रखी थीं क्योंकि आज वो आ रहे थे और यहीं रुकने वाले थे। थोड़ी देर बाद जीजू आ गए। सबने मिलकर डिनर किया। खाने के दौरान बातें सामान्य रहीं — काम के बारे में, घर के बारे में। खाना खत्म होने के बाद सब बैठे रहे। धीरे-धीरे मम्मी-पापा और छोटा भाई अपने कमरों में चले गए। अब सिर्फ मैं, दीदी, जीजू और भाई रह गए थे।

लगभग दस मिनट की बातों में दीदी ने पाँच-छह बार जीजू से कहा, “अब सो जाओ… थक गए होंगे।” जीजू मुस्कुराते रहे। फिर उन्होंने कहा, “गाड़ी में एक छोटी सी बैग पड़ी है। जाकर ले आ।”

मैं उठकर गाड़ी के पास गई। बैग निकाली। जिज्ञासावश थोड़ा खोला तो अंदर तीन पैकेट कंडोम और कुछ चॉकलेट्स दिखीं। मैंने जल्दी से बंद किया और वापस अंदर ले आई। जीजू ने बैग ली। उन्होंने एक चॉकलेट भाई को दी और एक मुझे भी पकड़ा दी। भाई चॉकलेट लेकर चला गया।

अब सिर्फ तीन रह गए थे। दीदी ने धीमी आवाज में पूछा, “हमारी वाली चॉकलेट लाए हो? पूरी रात के लिए?”

जीजू ने सिर हिलाया, “हाँ… लाया हूँ। बहुत सारी।”

दीदी ने हल्के से मुस्कुराते हुए कहा, “आज ही पूरी करनी है।”

मैं समझ गई। मैंने जल्दी से उठकर कहा, “मैं अपने कमरे में जा रही हूँ।” और बिना और कुछ बोले अपने कमरे में आ गई। पीछे दीदी और जीजू भी अपने कमरे की तरफ बढ़ गए। दरवाजे की हल्की आवाज सुनाई दी।

मैं अपने बिस्तर पर लेट गई। बाहर की हलचल अब शांत पड़ गई थी। रात फिर से अपने रंग में ढलने वाली थी।

 

मैं अपने कमरे में ज्यादा देर तक नहीं बैठ सकी। दिल की धड़कन तेज हो चुकी थी। वही पुराना छेद अभी भी वैसा ही था। मैंने धीरे से आँख मिलाई।

अंदर की रोशनी हल्की पीली थी। दीदी और जीजू दोनों कमरे में थे। जीजू अभी कुर्सी पर बैठकर मोबाइल देख रहा था। दीदी दरवाजा बंद करने के बाद कुछ पल खड़ी रही। फिर उसने धीरे से अपनी साड़ी की पल्लू हटाई। उसके चेहरे पर एक अजीब सी बेचैनी थी। वो बार-बार जीजू की तरफ देख रही थी।

थोड़ी देर बाद दीदी खुद जीजू के पास गई। उसने मोबाइल उसके हाथ से लिया और टेबल पर रख दिया। जीजू ने सिर उठाकर उसकी तरफ देखा। दीदी ने कोई बात नहीं की। बस उसके कंधों पर दोनों हाथ रखे और खुद को उसके ऊपर झुका लिया। अगले ही पल दोनों के होंठ जुड़ गए।

पहला किस हल्का नहीं था। दीदी खुद जोर से होठों को दबा रही थी। जीजू थोड़ा हैरान रह गया, लेकिन उसने तुरंत जवाब दिया। दोनों का किस गहरा और गीला हो गया। दीदी की जीभ जीजू के मुँह में घुस गई थी। वो उसके निचले होठ को चूस रही थी। जीजू के हाथ उसकी कमर पर आ गए। दीदी और करीब सट गई। उसका शरीर जीजू के शरीर से पूरी तरह चिपक गया था।

किस टूटने का नाम नहीं ले रहा था। दीदी कभी जीजू का चेहरा दोनों हाथों में लेती, कभी उसके बालों में उँगलियाँ फेरती। उसकी साँसें तेज हो चुकी थीं। जीजू ने भी अब कमर में जोर पकड़ लिया था। उसने दीदी को अपनी गोद में खींच लिया। दीदी ने खुद ही साड़ी का पल्लू पूरी तरह हटा दिया और जीजू के कंधों को कसकर पकड़ लिया।

थोड़ी देर बाद दीदी ने किस तोड़ा। उसकी आँखें लाल थीं और होठ चमक रहे थे। उसने धीमी लेकिन अधीर आवाज में कहा,
“आज बहुत तड़प हो रही है… सह नहीं पा रही…”

जीजू कुछ कह पाता उससे पहले दीदी फिर से उसके होठों पर टूट पड़ी। इस बार किस और भी जोरदार था। दीदी खुद जीजू के ऊपर सवार होने की कोशिश कर रही थी। उसने जीजू की शर्ट के बटन खोलने शुरू कर दिए। एक-एक करके बटन खुलते गए। दीदी के हाथ उसके सीने पर फिरने लगे। जीजू ने उसकी कमर में हाथ डालकर उसे और कस लिया।

दीदी अब बिल्कुल काबू में नहीं लग रही थी। उसने जीजू की शर्ट उसके कंधों से नीचे सरका दी और खुद उसके गले में मुँह लगा दिया। वो उसके गले को चूम रही थी, हल्के दाँतों से काट रही थी। जीजू की साँसें भारी हो गईं। उसने दीदी के बाल पकड़कर उसका चेहरा ऊपर उठाया और फिर से जोर से किस करने लगा। दोनों के शरीर एक-दूसरे से रगड़ खा रहे थे।

दीदी ने अचानक जीजू को कुर्सी से खींच लिया और बेड की तरफ धकेलने लगी। जीजू मुस्कुरा रहा था, लेकिन दीदी की आँखों में सिर्फ भूख थी। उसने जीजू को बेड पर धकेल दिया और खुद उसके ऊपर चढ़ गई। साड़ी अब गड़बड़ा चुकी थी। दीदी ने खुद ही अपनी साड़ी को ऊपर किया और जीजू के ऊपर बैठ गई। दोनों फिर से किस में खो गए। दीदी के हाथ जीजू के बालों में थे और वो उसके मुँह को छोड़ने को तैयार नहीं थी।

मैं छेद से यह सब देख रही थी। मेरी अपनी साँसें तेज हो चुकी थीं। दीदी पहली बार इतनी आगे बढ़कर जीजू पर टूट रही थी। वो खुद उसकी शर्ट उतार रही थी, खुद किस कर रही थी, खुद उसके शरीर पर रगड़ खा रही थी। कमरे में सिर्फ उनके भारी साँसों और होठों की गीली आवाजें गूँज रही थीं।

दीदी ने थोड़ी देर बाद किस तोड़ा और सीधा जीजू के कान में कुछ फुसफुसाया। जीजू ने उसके कूल्हों को पकड़ लिया। दीदी की आँखें बंद थीं और वो अपनी कमर हल्के-हल्के हिला रही थी। साड़ी अब पूरी तरह बेड पर बिखर चुकी थी। दीदी सिर्फ ब्लाउज और पेटीकोट में जीजू के ऊपर बैठी हुई थी। वो फिर से उसके होठों पर झुक गई।

किस इस बार और लंबा और गहरा था। दीदी की उँगलियाँ जीजू की छाती पर नाखून गड़ा रही थीं। जीजू के हाथ उसकी पीठ पर ब्लाउज के हुक खोलने की कोशिश कर रहे थे। दीदी ने खुद ही थोड़ा सा शरीर उठाया ताकि हुक आसानी से खुल जाए। ब्लाउज ढीला पड़ गया। दीदी ने उसे अपने कंधों से नीचे गिरा दिया। अब वो सिर्फ ब्रा में जीजू के ऊपर थी।

वो फिर से उसके मुँह से चिपक गई। दोनों का शरीर एक-दूसरे से सटा हुआ था। दीदी की तड़प साफ दिख रही थी। वो जीजू को छोड़ने को बिल्कुल तैयार नहीं थी। कमरे में गर्मी बढ़ चुकी थी। दोनों के शरीर पर हल्का पसीना चमक रहा था। दीदी लगातार जीजू के होठों, गले और छाती को चूम रही थी। उसकी साँसें अब पूरी तरह बिखर चुकी थीं।

मैं देर तक वहाँ खड़ी रही। दीदी की ये अधीरता मैंने पहले कभी नहीं देखी थी। एक महीने पहले जो शर्मीली दीदी थी, आज वो खुद जीजू पर टूट पड़ी थी। छेद के बाहर मेरा दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। अंदर दीदी और जीजू अभी भी किस और रोमांस में पूरी तरह डूबे हुए थे।

किस और रोमांस काफी देर तक चलता रहा। दीदी अभी भी जीजू के ऊपर बैठी हुई थी। दोनों के होंठ बार-बार जुड़ते और अलग होते। दीदी की साँसें तेज चल रही थीं। जीजू ने उसके ब्रा के हुक खोले। ब्रा ढीली पड़ते ही दीदी ने थोड़ा सा शरीर उठाया और ब्रा को कंधों से नीचे सरका दिया। उसके दोनों स्तन अब पूरी तरह खुले हुए थे। एक महीने में वो पहले से थोड़े भरे लग रहे थे। निप्पल सख्त और गुलाबी थे।

जीजू ने दोनों हाथों से उसके स्तन पकड़ लिए और जोर से दबाने लगा। दीदी की कमर में सिहरन दौड़ गई। जीजू ने सिर उठाया और एक निप्पल को मुँह में ले लिया। उसने जोर-जोर से चूसना शुरू कर दिया। कभी दाँतों से हल्का काटता, कभी जीभ से गोल-गोल घुमाता। दीदी की आँखें बंद हो गईं और उसके मुँह से हल्की आवाजें निकलने लगीं —

“आह… हम्म… जोर से…”

जीजू ने दूसरा स्तन भी नहीं छोड़ा। एक को मुँह में लेकर चूसता और दूसरे को हाथ से मसलता। दीदी की उँगलियाँ उसके बालों में फँस गईं। वो खुद अपना सीना उसके मुँह की तरफ और दबा रही थी। जीजू की भूख साफ दिख रही थी। वो दोनों स्तनों को बारी-बारी से जोर-जोर से चूस रहा था। दीदी के स्तनों पर उसकी लार चमक रही थी।

थोड़ी देर बाद दीदी ने खुद ही जीजू के ऊपर से उठना शुरू किया। उसने जीजू की पैंट का बटन खोला और जिप नीचे की। जीजू ने थोड़ा कमर उठाई। दीदी ने उसकी पैंट और अंडरवियर एक साथ नीचे खींच दी। जीजू का १२ इंच का मोटा लंड झटके से बाहर आ गया — पूरी तरह खड़ा, नसों से भरा और सिर चमकता हुआ।

मैं छेद से देखकर एक पल के लिए स्तब्ध रह गई।

दीदी ने कुछ पल उस लंड को देखा। फिर वो धीरे-धीरे जीजू की टाँगों के बीच में खिसक गई। उसने लंड को एक हाथ में पकड़ा। उसकी उँगलियाँ पूरी तरह घेर नहीं पा रही थीं। दीदी ने थोड़ी देर उसे ऊपर-नीचे सहलाया। फिर उसने सिर झुकाया और लंड के मोटे सिर को अपने होठों से छूआ।

अगले ही पल उसने मुँह खोलकर लंड का सिर अपने मुँह में ले लिया।

मैं हैरान रह गई। दीदी, जो पहले शर्माती थी, आज खुद जीजू का लंड मुँह में ले रही थी। उसने होठों को गोल करके सिर को अंदर खींचा। धीरे-धीरे लंड उसके मुँह में सरकने लगा। करीब चार इंच तक गया। फिर दीदी ने और कोशिश की। लंड और अंदर गया — लगभग छह इंच तक। उससे ज्यादा उसके मुँह में नहीं जा पा रहा था। बाकी का हिस्सा बाहर ही रह गया।

दीदी ने आँखें बंद कर लीं और सिर ऊपर-नीचे करने लगी। उसकी चाल धीमी लेकिन नियमित थी। वो लंड को चूस रही थी, होठों से दबा रही थी, और कभी-कभी जीभ से सिर के नीचे वाले हिस्से को सहला रही थी। उसकी गालें धँस रही थीं। गले से हल्की गीली आवाजें आ रही थीं। दीदी पूरी तरह मजे ले रही थी। उसका एक हाथ लंड के निचले हिस्से को पकड़े हुए था और दूसरा हाथ जीजू की जाँघ पर टिका था।

जीजू ने सिर पीछे किया और साँस भारी भरने लगा। उसने दीदी के बालों में हाथ डाल दिया। वो उसके सिर को हल्के से गाइड कर रहा था, लेकिन जोर नहीं लगा रहा था। दीदी खुद ही लय में थी। कभी वो लंड को लगभग पूरा छह इंच तक अंदर ले जाती, कभी सिर्फ सिर को चूसती। उसकी लार लंड पर चमक रही थी और धीरे-धीरे नीचे की तरफ बहने लगी थी।

मैं छेद के पीछे खड़ी यह सब देखे जा रही थी। मेरा दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। दीदी की ये हिम्मत और मजा देखकर मुझे खुद पर यकीन नहीं हो रहा था। एक महीने पहले जो दीदी दर्द से चीख रही थी, आज वो खुद जीजू के लंड को मुँह में लेकर मजे से चूस रही थी। कमरे में सिर्फ उसकी गीली आवाजें और जीजू की भारी साँसें गूँज रही थीं।

दीदी काफी देर तक यही करती रही। कभी लय तेज करती, कभी धीमी। जीजू की जाँघें तन गई थीं। उसने दीदी के बालों को और कस लिया। दीदी ने आँखें थोड़ी खोलीं और ऊपर देखा। उसकी आँखों में भी वासना साफ थी। फिर उसने फिर से सिर झुकाया और लंड को और गहराई तक मुँह में लेने की कोशिश करने लगी। छह इंच तक ही जा पा रहा था, लेकिन वो उसी में पूरा मजा ले रही थी।

मैं देर तक वहाँ खड़ी रही। दीदी लगातार चूस रही थी और जीजू उसका पूरा आनंद ले रहा था। कमरे का तापमान और बढ़ चुका था। दोनों पूरी तरह नंगे थे और एक-दूसरे में खोए हुए थे।

दीदी काफी देर से जीजू का लंड मुँह में लिए हुए थी। उसका सिर नियमित गति से ऊपर-नीचे हो रहा था। छह इंच तक लंड उसके मुँह में जा रहा था और बाकी हिस्सा उसके हाथ में था। लार की चमक लंड पर फैल चुकी थी। दीदी की आँखें अधिकतर बंद थीं और वो पूरी लगन से चूस रही थी। कभी होठों से जोर से दबाती, कभी जीभ से सिर को घुमाती। उसकी साँसें नाक से तेज चल रही थीं।

जीजू का हाथ उसके बालों में था। उसकी साँसें अब बहुत भारी हो चुकी थीं। जाँघें तन गई थीं और कमर हल्की-हल्की ऊपर उठ रही थी। थोड़ी देर बाद जीजू ने दबी हुई आवाज में कहा,

“बस… होने वाला है… मेरा पूरा पी जाना…”

दीदी ने उसकी बात सुनी लेकिन रुकी नहीं। उसने उल्टा और जोर से चूसना शुरू कर दिया। सिर की गति तेज हो गई। लंड उसके मुँह में और गहराई तक जाने लगा। जीजू की उँगलियाँ उसके बालों में कस गईं। उसकी साँसें अटकने लगीं। कुछ ही पल बाद जीजू के शरीर में एक जोरदार कंपन दौड़ा। उसने दीदी के सिर को अपने करीब दबाया और निकलने लगा।

दीदी ने लंड को मुँह से नहीं निकाला। वो वहीं रखा रहा। जीजू का सारा पानी उसकी जीभ और गले में जाता रहा। दीदी ने गले से निगलने की आवाज तक नहीं आने दी। उसने पूरा निगल लिया। कुछ बूँदें होठों के कोने से निकलीं तो उसने जीभ से साफ कर लिया। जीजू का शरीर अभी भी हल्के-हल्के काँप रहा था। दीदी ने लंड को मुँह में ही रखा रखा और धीरे-धीरे साफ किया। जब पूरी तरह साफ हो गया तभी उसने उसे बाहर निकाला।

जीजू बेड पर फैला हुआ था। साँसें तेज चल रही थीं। दीदी उसके पैरों के बीच बैठी हुई थी। उसके होठ चमक रहे थे और आँखों में एक अजीब सी संतुष्टि थी। उसने हल्के से मुस्कुराते हुए जीजू की जाँघ पर हाथ फेरा।

मैं छेद के पीछे स्तब्ध खड़ी थी। मेरा दिमाग सुन्न पड़ गया था। सिर्फ बीस दिन पहले जो दीदी दर्द से चीख-चीखकर रो रही थी, जो पहले स्पर्श से भी डरती थी… आज वही दीदी जीजू का लंड मुँह में लेकर मजे से चूस रही थी और अंत में सब कुछ पी भी गई थी। बिना हिचकिचाहट के। बिना कोई शिकायत किए।

बीस दिन में वो पूरी तरह बदल चुकी थी।
शर्म की जगह अब भूख थी।
डर की जगह अब चाहत थी।

मैंने धीरे से साँस ली। अंदर दीदी अब जीजू के पास जाकर लेट गई थी। दोनों की साँसें अभी भी तेज थीं। कमरे में एक अलग सी शांति फैल गई थी।

 

 

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