दीदी की शादी और सुहागरात 5
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दीदी ने जीजू का सब कुछ पी लिया था। उसका लंड अभी भी उसके हाथ में था, लेकिन अब वो पहले जैसा सख्त नहीं रह गया था। जीजू बेड पर फैला हुआ भारी साँसें ले रहा था। दीदी उसके पैरों के बीच बैठी हुई थी। उसके होठ चमक रहे थे और आँखों में एक अजीब सी तृप्ति थी। लेकिन उसका अपना शरीर अभी भी बेचैन था। जाँघें हल्की-हल्की काँप रही थीं और साँसें तेज चल रही थीं। उसका खत्म अभी तक नहीं हुआ था।
जीजू ने कुछ पल आँखें बंद रखकर आराम किया। फिर उसने दीदी की तरफ देखा। उसकी नजर दीदी की जाँघों पर गई। दीदी अभी भी नंगी थी। उसकी चूत हल्की चमक रही थी। जीजू ने धीरे से उठकर दीदी के कंधों को पकड़ा और उसे बेड पर लिटा दिया। दीदी बिना किसी विरोध के लेट गई। उसकी आँखें जीजू को देख रही थीं।
जीजू ने उसकी दोनों टाँगें फैलाईं। फिर वो उसके बीच में आ गया और अपना चेहरा उसकी चूत के करीब ले गया। दीदी की साँस एकदम से रुक गई। जीजू ने पहले हल्के से उसकी जाँघों के अंदरूनी हिस्से को चूमा। फिर जीभ निकालकर चूत के ऊपर वाले हिस्से को धीरे से चाटा। दीदी की कमर हल्की सी उठ गई।
“आह…” उसकी आवाज निकल गई।
जीजू ने और जोर लगाया। उसने दोनों हाथों से दीदी की जाँघें और चौड़ी कीं और अपना मुँह पूरी तरह उसकी चूत पर लगा दिया। जीभ अंदर-बाहर होने लगी। वो जोर-जोर से चूस रहा था। कभी क्लिटोरिस को होठों में लेकर खींचता, कभी जीभ को अंदर तक घुसाकर घुमाता। दीदी के हाथ बेड की चादर को कसकर पकड़ने लगे। उसकी कमर बार-बार ऊपर उठ रही थी।
“आह्ह… हम्म… जोर से… वहीं…” दीदी की आवाज अब साफ सुनाई दे रही थी।
जीजू ने रफ्तार बढ़ा दी। वो लगातार और जोर से चूस रहा था। उसकी जीभ तेज गति से घूम रही थी। दीदी का शरीर अब काबू में नहीं रह गया था। उसकी टाँगें काँप रही थीं और एड़ियाँ बेड पर रगड़ खा रही थीं। उसने एक हाथ जीजू के सिर पर रख दिया और उसे अपनी तरफ और दबाया। जीजू ने और गहराई तक जीभ घुसा दी। चूसने की आवाज अब गीली और तेज हो गई थी।
दीदी की साँसें पूरी तरह बिखर चुकी थीं। उसका पेट ऊपर-नीचे हो रहा था। माथे पर पसीना आ गया था। वो सिर इधर-उधर हिला रही थी। आवाजें अब और तेज हो गई थीं —
“आह्ह्ह… नहीं… वहीं… जोर से चूसो… आआह्ह…”
जीजू ने दोनों हाथों से उसकी गांड को पकड़ लिया और चूत को अपने मुँह से और कसकर चिपका लिया। वो बिना रुके चूसता जा रहा था। दीदी का शरीर अकड़ने लगा। उसकी जाँघें जीजू के सिर को जकड़ने लगीं। कुछ ही पल बाद दीदी की कमर जोर से उठी और उसके मुँह से एक लंबी, काँपती हुई आवाज निकली —
“आआआह्ह्ह!!!!!!! आ गया… आ गया… आआह्ह्ह…”
उसकी चूत से दबाव के साथ पानी की एक तेज धार निकली। जीजू ने मुँह नहीं हटाया। उसने आधा पानी अपने मुँह में ले लिया और निगल गया। बाकी उसकी ठुड्डी और गर्दन पर बह गया। दीदी का शरीर बार-बार काँप रहा था। उसकी चूत में अभी भी कंपन चल रहे थे। जीजू ने धीरे-धीरे जीभ से साफ किया और फिर अपना चेहरा ऊपर उठाया। उसके होंठ और ठुड्डी गीले चमक रहे थे।
दीदी बेड पर फैली हुई थी। आँखें बंद थीं और साँसें हाँफ रही थीं। पूरा शरीर ढीला पड़ चुका था। जीजू उसके पास आकर लेट गया। उसने दीदी के पेट पर हाथ फेरा। दीदी ने आँखें खोलीं और उसकी तरफ देखा। दोनों की आँखों में थकान और संतुष्टि दोनों थी।
मैं छेद के पीछे खड़ी यह सब देखे जा रही थी। मेरा दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। दीदी का पानी निकलते देखकर और जीजू द्वारा उसे पीते देखकर मुझे खुद पर यकीन नहीं हो रहा था। सिर्फ बीस-पच्चीस दिनों में दीदी इतनी बदल चुकी थी। पहले जो दर्द और शर्म थी, अब उसकी जगह पूरी तरह मजा और तृप्ति ने ले ली थी।
कमरे में अब सिर्फ दोनों की भारी साँसें गूँज रही थीं। दीदी ने करवट ली और जीजू की छाती पर सिर रख दिया। जीजू ने उसके बालों में हाथ फेरना शुरू कर दिया। दोनों थककर एक-दूसरे से सट गए थे।
मैंने धीरे से साँस ली
पाँच मिनट भी नहीं बीते होंगे कि जीजू का लंड फिर से पूरी तरह खड़ा हो चुका था। वो दीदी के बगल में लेटा हुआ था, लेकिन उसकी नजर बार-बार दीदी के शरीर पर जा रही थी। दीदी अभी भी हल्की साँसें ले रही थी। उसका शरीर पिछली चरम सीमा के बाद ढीला पड़ा था, लेकिन आँखों में अभी भी वासना बाकी थी।
दीदी ने करवट ली और जीजू के लंड की तरफ देखा। वो फिर से तना हुआ था। दीदी ने धीमी लेकिन साफ आवाज में कहा,
“अब… चूत में भी लंड डालो।”
मैं छेद के पीछे सुनकर एकदम स्तब्ध रह गई। दीदी के मुँह से ये शब्द निकलना… वो दीदी जो पहले दर्द से चीखती थी, आज खुद मांग रही थी। मेरा दिल जोर से धड़क उठा।
जीजू मुस्कुराया। उसने बेड के किनारे रखे बैग से एक कंडोम निकाला और दीदी की तरफ बढ़ा दिया।
“खुद पहना।”
दीदी ने कंडोम लिया। पैकेट खोला और जीजू के लंड को एक हाथ से पकड़कर कंडोम चढ़ाने लगी। लंड इतना मोटा था कि कंडोम खिंचते-खिंचते चढ़ा। दीदी की उँगलियाँ उसके ऊपर फिर रही थीं। जब कंडोम पूरी तरह चढ़ गया तो दीदी ने खुद ही करवट ली और घुटनों के बल हो गई। उसने तकिया आगे किया और अपना सिर उस पर रख दिया। गांड पीछे की तरफ उठा ली। उसकी चूत साफ दिख रही थी — अभी भी थोड़ी चमकदार और खुली हुई।
जीजू उसके पीछे आ गया। उसने दोनों हाथों से दीदी की कमर पकड़ी और लंड का सिर उसकी चूत पर लगाया। हल्के से रगड़ा। फिर धीरे से धक्का दिया। लंड का सिर अंदर चला गया। दीदी की साँस भारी भर गई।
“आह… हाँ… अंदर करो…”
जीजू ने और धक्का दिया। आधा लंड अंदर चला गया। दीदी की कमर झुक गई। फिर एक लंबा धक्का और पूरा १२ इंच अंदर समा गया। दीदी के मुँह से लंबी आह निकली —
“आआह्ह्ह… पूरा… बहुत गहरा…”
जीजू ने रुककर पूछा, “दर्द तो नहीं?”
दीदी ने सिर हिलाया, “नहीं… अब मजा आ रहा है… जोर से मारो…”
जीजू ने दोनों हाथों से उसकी कमर कस ली और धक्के शुरू कर दिए। पहले धीमे, फिर तेज। हर धक्के के साथ दीदी की गांड उसकी जाँघों से टकरा रही थी। आवाज साफ आ रही थी — थप… थप… थप…। दीदी की आवाजें भी निकलने लगीं।
“आह… हाँ… वहीं… जोर से… और गहरा…”
जीजू ने रफ्तार बढ़ा दी। अब वो जोर-जोर से पेल रहा था। पूरा लंड हर बार जड़ तक जा रहा था और बाहर निकलते समय दीदी की चूत उसे कसकर पकड़ रही थी। दीदी के स्तन हर धक्के के साथ आगे-पीछे झूल रहे थे। उसने तकिया कसकर पकड़ लिया था। उसका चेहरा तकिए में आधा धँसा हुआ था, लेकिन आवाजें दब नहीं पा रही थीं।
“आह्ह्ह… राहुल… बहुत जोर से… अच्छा लग रहा है… और तेज मारो…”
मैं छेद से देखे जा रही थी। मेरी आँखें फटी हुई थीं। दीदी सच में मजे ले रही थी। वो खुद अपनी गांड पीछे की तरफ धकेल रही थी ताकि लंड और गहराई तक जाए। जीजू कभी उसके बाल पकड़ लेता, कभी उसकी गांड पर थप्पड़ मारता। हर थप्पड़ पर दीदी की आवाज और तेज हो जाती।
“हाँ… मारो… और जोर से… आह्ह्ह…”
समय बीतता जा रहा था। दस मिनट, बीस मिनट, तीस मिनट… जीजू की रफ्तार कम नहीं हो रही थी। पसीना दोनों के शरीर पर चमक रहा था। दीदी की जाँघें काँप रही थीं, लेकिन वो रुकने को नहीं कह रही थी। उल्टे और मांग रही थी।
“और तेज… पूरी तरह फाड़ दो… आज बहुत तड़प थी… आह्ह्ह…”
जीजू ने उसकी कमर और कस ली। धक्के अब बहुत तेज और गहरे हो गए थे। बेड जोर-जोर से हिल रहा था। दीदी की आवाजें अब लगभग चीख जैसी हो गई थीं, लेकिन उनमें दर्द नहीं, पूरा मजा था।
“आआह्ह्ह… वहीं… मत रोकना… और… और…”
चालीस मिनट हो चुके थे। जीजू की साँसें हाँफ रही थीं, लेकिन वो रुका नहीं। दीदी भी थक चुकी थी, लेकिन उसकी कमर अभी भी मिल रही थी। पचास मिनट के करीब जीजू की रफ्तार एकदम चरम पर पहुँच गई। उसने दीदी की कमर जकड़ ली और बहुत गहरे-गहरे धक्के मारने लगा। दीदी की आवाज टूट गई।
“आआआह्ह्ह… आ गया… मैं… आआह्ह्ह…”
दीदी की चूत में जोरदार कंपन शुरू हो गए। उसी समय जीजू ने भी पूरा लंड अंदर धँसाए रखकर जोर से निकलना शुरू कर दिया। दोनों एक साथ काँप रहे थे। दीदी बेड पर आगे की तरफ गिर गई। जीजू उसके ऊपर झुका रहा। दोनों की साँसें बहुत तेज चल रही थीं।
थोड़ी देर बाद जीजू ने लंड बाहर निकाला। कंडोम में सफेद तरल भरा हुआ था। उसने कंडोम उतारकर एक तरफ फेंक दिया। दीदी अभी भी मुँह के बल गिरी हुई थी। उसका शरीर हल्के-हल्के काँप रहा था।
जीजू उसके पास लेट गया। दोनों कुछ देर चुपचाप साँस सँभालते रहे। फिर जीजू ने दीदी के बालों में हाथ फेरा और धीमी आवाज में कहा,
“आज तो बहुत मजा आया… अभी ३-४ राउंड और मार सकते हैं।”
दीदी ने थकी हुई आवाज में जवाब दिया,
“हाँ… थोड़ा आराम करके… फिर से… आज पूरी रात…”
मैं छेद के पीछे यह सब सुन रही थी। मेरा दिमाग सुन्न पड़ गया था। दीदी की बातें, उसकी आवाजें, उसका पूरा मजा लेना… सब कुछ मेरे लिए बहुत अजीब और चौंकाने वाला था। बीस-पच्चीस दिन पहले जो दीदी दर्द से रो रही थी, आज वही दीदी खुद जोर-जोर से मांग रही थी और पचास मिनट तक बिना रुके मजे ले रही थी।
मैं और देर तक खड़ी नहीं रह सकी। शरीर में अजीब सी थकान और उत्तेजना दोनों थी। मैंने धीरे से छेद से नज़र हटाई और अपने बिस्तर पर जाकर लेट गई। आँखें बंद कीं। बाहर कमरे से अब सिर्फ हल्की बातों की आवाज आ रही थी। दीदी और जीजू अभी भी ३-४ राउंड की बात कर रहे थे।
मेरी आँखें भारी हो गईं। थकान ने धीरे-धीरे मुझे जकड़ लिया। कुछ देर बाद मैं सो गई।
कमरे में दीदी और जीजू अभी भी जाग रहे होंगे… लेकिन मैं सो चुकी थी।
रात के लगभग चार बज रहे थे। मुझे प्यास लगी। नींद अधूरी थी। मैंने धीरे से बिस्तर से उठकर पानी लिया। गले में पानी डालते हुए अचानक ख्याल आया कि दीदी वाले कमरे में अभी भी हल्की हलचल हो सकती है। मैंने चुपचाप छेद की तरफ कदम बढ़ाए और आँख मिलाई।
अंदर की तस्वीर देखकर मैं एक पल के लिए ठहर गई।
दीदी घुटनों के बल बेड पर झुकी हुई थी। जीजू की कमर के पास उसका सिर था। जीजू का लंड पूरी तरह खड़ा था। दीदी उसे मुँह में लिए हुए ऊपर-नीचे कर रही थी। उसकी चाल धीमी लेकिन गहरी थी। लार की चमक लंड पर फैल रही थी। जीजू बेड पर लेटा हुआ दीदी के बालों में हाथ फेर रहा था। दोनों पूरी तरह जाग रहे थे।
थोड़ी देर चूसने के बाद दीदी ने लंड मुँह से निकाला। उसने बेड पर रखा कंडोम का पैकेट उठाया, खोला और जल्दी से लंड पर चढ़ा दिया। कंडोम खिंचते हुए चढ़ा। फिर दीदी ने खुद ही जीजू की कमर के दोनों तरफ घुटने टिकाए और लंड को अपनी चूत पर सेट किया। धीरे से नीचे बैठती गई। पूरा लंड अंदर समा गया। दीदी की लंबी आह निकली।
“आह्ह्ह… पूरा अंदर…”
फिर उसने कमर हिलानी शुरू कर दी। पहले धीरे, फिर तेज। वो खुद ऊपर-नीचे हो रही थी। स्तन जोर-जोर से काँप रहे थे। जीजू के हाथ उसकी कमर पर थे, लेकिन असली मेहनत दीदी खुद कर रही थी। वो जोर-जोर से बैठ रही थी। हर बार लंड जड़ तक जा रहा था। आवाजें साफ आ रही थीं — गीली और तेज।
“आह… हाँ… ऐसे… बहुत अच्छा लग रहा है…”
दीदी की रफ्तार बढ़ती जा रही थी। पसीना उसके शरीर पर चमक रहा था। वो कभी आगे झुक जाती, कभी सीधी होकर जोर से बैठती। जीजू नीचे से भी हल्के धक्के मार रहा था। दोनों की साँसें मिलकर एक हो गई थीं। समय बीतता जा रहा था। बीस मिनट, चालीस मिनट… एक घंटे के करीब दीदी लगातार ऊपर-नीचे हो रही थी। उसकी जाँघें काँपने लगी थीं, लेकिन वो रुकी नहीं।
आखिर में जीजू की साँसें बहुत तेज हो गईं। उसने दीदी की कमर कस ली और जोर से ऊपर धकेला। दीदी ने भी खुद को नीचे दबाया। दोनों एक साथ काँप उठे। जीजू निकल चुका था। दीदी कुछ पल वैसे ही बैठी रही, फिर धीरे से लंड बाहर निकाला। कंडोम में सफेद तरल भरा था। उसने उसे निकालकर एक तरफ रखा और जीजू के बगल में लेट गई।
दोनों कुछ देर साँस सँभालते रहे। फिर दीदी ने धीमी आवाज में बात शुरू की।
“बीस दिन हो गए थे बिना सेक्स किए। आज चार बार मरवा के तभी शांति मिली है।”
जीजू ने भी साँस छोड़ते हुए कहा,
“मुझे भी दस दिन हो गए थे। मैं भी तड़प रहा था। दस दिन पहले हमारी कामवाली को पूरी रात पेला था… तभी जाके सुकून मिला था। वरना मुझे बीच में ही तुम्हारे पास आना पड़ता।”
मैं छेद के पीछे यह सुनकर स्तब्ध रह गई। जीजू ने साफ कह दिया कि उसने कामवाली के साथ सेक्स किया। मैंने सोचा दीदी गुस्सा करेगी, कुछ कहेगी… लेकिन दीदी ने सिर्फ इतना कहा,
“कोई बात नहीं।”
उतने में ही बात खत्म हो गई। दीदी ने कोई सवाल नहीं किया, कोई उलाहना नहीं दिया। बस इतना सा जवाब। फिर दोनों चुप हो गए। थोड़ी देर बाद दीदी ने ब्रा और पैंटी पहनी। जीजू ने अंडरवियर पहन ली। दोनों चादर खींचकर सोने की मुद्रा में आ गए। साँसें धीरे-धीरे नियमित होने लगीं।
मैं देर तक वहाँ खड़ी रही। दिमाग में कई बातें घूम रही थीं। दीदी की स्वीकृति, उसकी शांति, और जीजू का इकबाल… सब कुछ मुझे अजीब लग रहा था। बीस दिन में दीदी जितनी बदली थी, उससे भी ज्यादा आज की बातों ने मुझे चौंका दिया।
आखिरकार मैंने छेद से नज़र हटाई और चुपचाप अपने बिस्तर पर आकर लेट गई। आँखें बंद कीं। बाहर अब सन्नाटा था। दीदी और जीजू सो चुके थे। मैं भी थककर आँखें बंद किए पड़ी रही। सुबह होने में अभी कुछ घंटे बाकी थे।
सुबह हुई तो सब कुछ सामान्य था। दीदी और जीजू दोनों सामान्य व्यवहार कर रहे थे। नाश्ता साथ में हुआ। कोई अजीब बात नहीं चली। दोपहर तक उन्होंने सामान समेटा और अपने घर के लिए निकल गए। विदाई हल्की थी। मम्मी ने दीदी को कुछ घरेलू चीजें दीं, पापा ने जीजू से सामान्य बातें कीं। मैंने भी दीदी को गले लगाया। कार निकलते ही घर फिर से अपनी पुरानी लय में आ गया।
उसके बाद दीदी बीच-बीच में घर आती रही। कभी दो दिन, कभी तीन दिन रुकती और फिर चली जाती। हर बार वो थोड़ी और निखरी हुई लगती। बातें सामान्य होतीं — घर का हाल, जीजू का काम, रिश्तेदार। निजी बातें बहुत कम छूतीं। धीरे-धीरे समय बीतता गया।
शादी को दस महीने हो चुके थे जब मैंने साफ नोटिस किया कि दीदी का शरीर काफी बदल चुका है। उसके स्तन पहले से बड़े और भरे हुए लगने लगे थे। कमर पतली रहने के बावजूद कूल्हे और गांड चौड़ी हो गई थी। कपड़ों में वो वक्र अधिक साफ दिखते। चेहरे पर भी एक अलग चमक थी। घर वाले इसे सामान्य बदलाव कहते, लेकिन मुझे पता था कि पीछे और भी कारण हैं।
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