फार्महाउस की दो रातें 4
· Online Admin
रात के लगभग साढ़े आठ बज रहे थे। दिन भर की थकान शरीर में थी, लेकिन अंदर कोई और भूख जल रही थी। हम दोनों बेडरूम में थे। उसने मेरी टी-शर्ट पहनी हुई थी, नीचे कुछ नहीं। मैं सिर्फ शॉर्ट्स में था।
मैंने उसे बाँहों में भर लिया और बोला, “नहा लें… साथ में।”
वो बिना कुछ कहे मेरे साथ बाथरूम चल दी। बड़ा बाथरूम था – ग्लास वाली शॉवर केबिनेट, अलग से बाथटब, और एक लंबा मार्बल का काउंटर। मैंने शॉवर ऑन किया। गर्म पानी बहने लगा। भाप पूरे बाथरूम में फैल गई।
दोनों नंगे हो गए। पानी के नीचे खड़े होकर मैंने उसके बाल पीछे किए और गर्दन चूसने लगा। उसने सिर झुका लिया। मेरे हाथ उसके स्तनों पर थे, जोर-जोर से मसल रहे थे। पानी उनके ऊपर से फिसल रहा था। फिर मेरा हाथ नीचे गया। उंगलियाँ उसके अंदर चली गईं – आसानी से, क्योंकि वो पहले से गीली थी।
“आज रात लंबा करना है,” मैंने उसके कान में कहा।
उसने सिर्फ कराहकर जवाब दिया।
मैंने उसे दीवार की तरफ मोड़ दिया। हाथ दीवार पर रखवाए। खुद पीछे खड़ा होकर कंडोम पहना, लुब्रिकेंट लगाया और एक झटके में अंदर तक घुस गया। पानी के नीचे ये अहसास और तेज़ था। मैंने उसके कूल्हे पकड़कर जोरदार धक्के देने शुरू किए। हर धक्के के साथ पानी छलक रहा था। उसकी कराहें बाथरूम में गूँज रही थीं। कभी-कभी वो दीवार पर माथा टिका लेती थी।
मैंने एक हाथ उसके बालों में फंसाया और हल्के से खींचा। दूसरा हाथ आगे बढ़ाकर उसके स्तनों को मसला। गति तेज़ होती गई। बाथरूम की काँच की दीवार पर भाप की बूंदें चमक रही थीं। लगभग पंद्रह मिनट बाद वो काँप उठी। अंदर की मांसपेशियाँ मेरे लंड को जकड़ रही थीं। मैंने रुककर खुद को रोका। अभी छोड़ना नहीं था।
कंडोम बदला। फिर से लुब्रिकेंट लगाया। इस बार मैंने उसे बाथटब में बिठाया। गर्म पानी भरा हुआ था। मैं भी उतर गया। उसे अपनी गोद में बैठाया – चेहरा मेरी तरफ। उसने खुद एडजस्ट किया और धीरे-धीरे बैठ गई। पानी के अंदर मूवमेंट धीमा और गहरा था। मैंने उसके कूल्हे पकड़कर ऊपर-नीचे करने में मदद की। उसके स्तन मेरे चेहरे के सामने थे। मैंने दोनों को बारी-बारी मुँह में लिया, दाँत से हल्के काटे। वो मेरे कंधों पर नाखून गाड़ रही थी।
बाथटब में हमने लगभग आधा घंटा बिताया। दो बार पहुँची वो। मैंने खुद को रोके रखा। आखिर में जब निकला तो कंडोम भारी हो चुका था।
नहाकर हम तौलिए से पोंछने लगे। लेकिन तौलिया से पोंछते-पोंछते फिर हाथ निकल गए। मैंने उसे काउंटर पर बिठा दिया। पैर फैलाए। खुद घुटनों के बल बैठा और मुँह लगा दिया। जीभ से धीरे-धीरे चाटा, फिर जोर से चूसा। दो उंगलियाँ अंदर डालकर घुमाईं। उसकी जाँघें मेरे सिर को जकड़ रही थीं। काउंटर पर बैठे-बैठे वो फिर से आ गई। इस बार इतनी जोर से कि उसकी आवाज़ निकल गई।
“बेडरूम चलो…” उसने हाँफते हुए कहा।
मैंने उसे गोद में उठाया और बेडरूम ले आया। बिस्तर पर फेंक दिया। चादरें पहले से बिगड़ी हुई थीं। मैंने नया कंडोम पहना। इस बार लुब्रिकेंट अच्छी मात्रा में लगाया – अंदर और बाहर दोनों जगह।
मैंने उसकी दोनों टाँगें अपने कंधों पर रखीं। पूरा मोड़ दिया। इस पोजीशन में गहराई सबसे ज्यादा मिलती थी। मैंने धीरे से एंट्री की। पहले थोड़ा रुका। फिर पूरा अंदर तक धकेला। उसने जोर से साँस ली।
“इतना गहरा…” उसकी आवाज़ काँप रही थी।
मैंने मूवमेंट शुरू की। लंबी, गहरी, धीमी। हर धक्के के साथ उसके अंदर तक जा रहा था। पलंग की चरमराहट तेज़ हो गई। मैंने गति बढ़ाई। उसके स्तन ऊपर-नीचे हो रहे थे। आँखें बंद थीं, होंठ खुले। कभी-कभी वो मेरे हाथ पकड़ लेती थी, कभी चादर मरोड़ लेती थी।
बीस मिनट बाद मैंने पोजीशन बदली। उसे करवट लेटाया। पीछे से एक टाँग उठाकर एंट्री की। इस एंगल में मैं उसके कान में बातें कर सकता था।
“कितना अंदर तक जा रहा है महसूस हो रहा है?”
“हाँ… पूरा…”
“और जोर से करूँ?”
“करो…”
मैंने जोर बढ़ा दिया। एक हाथ उसके स्तन पर था, दूसरा क्लिट सहला रहा था। वो पागल हो रही थी। कराहें अब खुलकर निकल रही थीं। फार्महाउस के बड़े कमरे में आवाज़ें गूँज रही थीं।
रात के लगभग ग्यारह बज चुके थे। हमने फिर से पोजीशन बदली। अब वो ऊपर थी। कॉउगर्ल। उसने खुद कंट्रोल लिया। तेज़ी से ऊपर-नीचे होने लगी। उसके बाल चेहरे पर गिर रहे थे। पसीना चमक रहा था। मैंने उसके कूल्हे पकड़कर और तेज़ कर दिए। बिस्तर जोर-जोर से हिल रहा था।
जब वो चरम पर पहुँची तो उसका पूरा शरीर कठोर हो गया। मैंने भी खुद को नहीं रोका। कंडोम के अंदर सब कुछ छोड़ दिया।
दोनों बिस्तर पर गिरे। साँसें तेज़ चल रही थीं। शरीर चिपक रहे थे। मैंने कंडोम हटाया और फेंक दिया। फिर उसे बाँहों में ले लिया।
“थोड़ा आराम…” उसने कहा।
हम लगभग बीस मिनट लेटे रहे। पानी पिया। फिर उसका हाथ फिर से मेरे लंड पर आ गया। वो फिर से सख्त हो रहा था।
“अभी भी?” मैंने पूछा।
उसने सिर हिलाया। “आज रात पूरी निकालनी है।”
मैंने हँसते हुए नया कंडोम निकाला। इस बार मैंने उसे बिस्तर के किनारे किया। खुद खड़ा होकर उसके पैर फैलाए और खड़े-खड़े पेलने लगा। इस पोजीशन में मेरी पूरी ताकत लग रही थी। हर धक्का गहरा और जोरदार था। उसकी आवाज़ निकल रही थी – कभी दबी हुई, कभी खुलकर। मैंने उसकी टाँगें और चौड़ी कीं। और तेज़ किया।
लगभग पंद्रह मिनट बाद दोनों फिर से पहुँचे।
रात अभी खत्म नहीं हुई थी। हमने बाथरूम में जाकर दोबारा नहाया। इस बार सिर्फ साफ होने के लिए। लेकिन शावर के नीचे फिर हाथ निकल गए। मैंने उसे दीवार से लगाकर उंगलियों से पहुँचाया। खुद नहीं छोड़ा।
वापस बिस्तर पर आकर हमने आखिरी राउंड किया। इस बार बहुत धीमा और लंबा। लगभग चालीस मिनट। सिर्फ एक-दूसरे को सहलाते हुए, धीरे-धीरे मूव करते हुए। आँखों में आँखें डाले। किस करते हुए। जब आखिर में पहुँचे तो दोनों के शरीर काँप रहे थे।
रात के लगभग दो बज गए थे। शरीर में अब दर्द भी था। जाँघों में, कमर में, कंधों में। लेकिन संतुष्टि भी पूरी थी।
मैंने लाइट बंद कर दी। उसे अपनी बाँहों में भर लिया। उसकी साँसें धीमी पड़ने लगीं।
“कल आखिरी दिन है…” उसने फुसफुसाया।
“हाँ,” मैंने जवाब दिया। “कल और यादगार बनाएंगे।”
बाहर पूरी तरह अँधेरा था। फार्महाउस शांत था। सिर्फ हमारी साँसें और एसी की आवाज़ बची थी। दूसरी रात भी पहली रात से कम नहीं रही थी। बल्कि और गहरी, और लंबी।
मैंने आँखें बंद कर लीं। उसके शरीर की गर्माहट महसूस करते हुए नींद में चला गया।
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