दीदी की शादी और सुहागरात 3
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दूसरा राउंड खत्म होने के बाद कमरे में भारी सन्नाटा छा गया था। दीदी बेड पर मुँह के बल गिरी हुई थी। उसका शरीर अभी भी हल्के-हल्के काँप रहा था। आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। साँसें तेज और अनियमित थीं। चूत से हल्का तरल और खून मिला हुआ अभी भी रिस रहा था। जीजू उसके बगल में बैठकर खुद की साँसें सँभाल रहा था। उसका शरीर पसीने से चमक रहा था।
थोड़ी देर बाद जीजू ने दीदी की पीठ पर हाथ फेरा। पहले बहुत धीरे, फिर थोड़ा और प्यार से। दीदी ने उसके हाथ को झटकने की कोशिश की, लेकिन ताकत नहीं बची थी। जीजू ने धीरे से उसे पलटा। दीदी की आँखें लाल और सूजी हुई थीं। गाल आँसुओं से भीगे हुए थे। वो जीजू की तरफ देखने के बजाय छत की तरफ टकटकी लगाए हुए थी।
जीजू ने उसके माथे के बाल हटाए और धीमी आवाज में कहा,
“अब नहीं… अब और नहीं करूँगा। बस कल मेरे घर जाकर ही सब शांत हो जाएगा। आज के लिए बस।”
दीदी ने कुछ नहीं कहा। सिर्फ एक लंबी सिसकी भरी। जीजू ने उसके गाल पर हाथ रखा और आँसू पोंछने की कोशिश की। दीदी ने इस बार हाथ नहीं हटाया। दोनों कुछ देर चुप रहे। कमरे में सिर्फ पंखे की आवाज और उनकी साँसें सुनाई दे रही थीं।
थोड़ी देर बाद जीजू ने फिर बात शुरू की।
“तू कितना जोर-जोर से चिल्ला रही थी… सच में। मुझे लगता है घर में सबको पता चल गया होगा। मम्मी-पापा, तेरी बहन… सबने सुना होगा। इसलिए मैं पहले से कह रहा था कि शादी से पहले ही कर लेते हैं… तो तू इतनी डरेगी नहीं। लेकिन तू हर बार मना कर देती थी।”
दीदी की आँखों में फिर से आँसू आ गए। उसने धीमी, काँपती आवाज में कहा,
“मुझे नहीं लगता… ये तुम्हारा पहली बार है। सच बताना। मुझे कोई फर्क नहीं पड़ेगा।”
जीजू कुछ पल चुप रहा। उसने दीदी की आँखों में देखा। फिर धीरे से सिर हिलाया।
“सच बताऊँ?”
दीदी ने सिर्फ सिर हिलाया।
जीजू ने साँस ली और बोला,
“नहीं… ये मेरा पहली बार नहीं है। मैंने पहले भी कई लड़कियों के साथ किया है। करीब दस-पंद्रह… कुछ बहनें… कुछ भाभियाँ भी। अलग-अलग जगहों पर। कुछ एक रात के लिए, कुछ बार-बार। ज्यादातर ने वैसा ही चिल्लाया जैसे तू चिल्ला रही थी। कुछ ने सह लिया, कुछ रोती रहीं। लेकिन आज यहाँ… तेरे साथ… ये सच में पहली बार है। सिर्फ दो राउंड किए। बाकी जगहों पर तो पाँच-छह तक हो जाते थे। वहाँ वाली लड़कियाँ भी चीखती थीं… लेकिन तू मेरी पत्नी है। तू मेरा प्यार है। मैं तुझे दुखी नहीं करना चाहता। आज ज्यादा हो गया… मुझे पता है।”
दीदी उसकी बातें सुनती रही। उसके चेहरे पर कई भाव एक साथ थे — गुस्सा, थकान, शर्म, और हल्की सी स्वीकारोक्ति। उसने धीमी आवाज में पूछा,
“तो… तुमने सच में इतनी लड़कियों के साथ…?”
जीजू ने सिर हिलाया।
“हाँ। लेकिन अब नहीं। अब सिर्फ तू है। आज जो हुआ… वो इसलिए क्योंकि पहली रात थी और मैं भी काबू में नहीं रह पाया। आगे से ध्यान रखूँगा।”
दीदी ने कुछ देर और चुप रहकर天井 की तरफ देखा। फिर धीरे से बोली,
“बहुत दर्द हुआ… बहुत।”
जीजू ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“पता है। इसलिए अब सो जा। कल नया घर है… नई शुरुआत। आज के लिए बस।”
उसने दीदी के शरीर पर से पसीना साफ करने की कोशिश की। फिर बेड से उठा और अपनी अंडरवियर ढूँढकर पहन ली। दीदी अभी भी नंगी लेटी हुई थी। जीजू ने उसकी ब्रा और पैंटी उठाई और उसके पास रखकर बोला,
“पहन ले… आराम से सो सकेगी।”
दीदी ने धीरे-धीरे ब्रा पहनी। हाथ काँप रहे थे। फिर पैंटी भी सरका ली। अब वो ब्रा और पैंटी में लेटी हुई थी। जीजू उसके बगल में आ गया। उसने चादर खींचकर दोनों पर डाल दी। दीदी ने पीठ उसकी तरफ कर ली। जीजू ने पीछे से अपना हाथ उसकी कमर पर रखा, लेकिन और कुछ नहीं किया।
थोड़ी देर दोनों चुप रहे। दीदी की सिसकियाँ धीरे-धीरे कम होने लगीं। उसकी साँसें नियमित पड़ने लगीं। जीजू भी थक चुका था। उसने आँखें बंद कर लीं। कमरे की रोशनी अभी भी जल रही थी, लेकिन दोनों में से किसी ने बुझाने की कोशिश नहीं की।
मैं छेद से यह सब देख और सुन रही थी। जीजू का इकबाल सुनकर मेरे मन में कई सवाल घूम रहे थे। दीदी की थकान और चुप्पी साफ दिख रही थी। धीरे-धीरे दोनों की साँसें गहरी होने लगीं। जीजू अंडरवियर में और दीदी ब्रा-पैंटी में… दोनों सो गए।
मैं और ज्यादा देर वहाँ नहीं खड़ी रह सकी। दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। मैंने धीरे से छेद से मुँह हटाया और बिल्कुल चुपचाप अपने कमरे का दरवाजा खोला। गलियारे में अंधेरा था। मैंने जैसे ही बाहर कदम रखा, मुझे आवाजें सुनाई दीं।
मैंने देखा कि मम्मी-पापा का कमरे का दरवाजा अभी-अभी बंद हुआ था। हल्की सी रोशनी दरवाजे के नीचे से आ रही थी। मुझे तुरंत समझ आ गया — वो दोनों भी बाहर खड़े सुन रहे थे। दीदी की चीखें उन्होंने भी सुनी थीं। मैं चुपचाप उनके दरवाजे के पास जाकर खड़ी हो गई। अंदर से आवाजें साफ आ रही थीं।
मम्मी की आवाज आई,
“हमारा दामाद भी बहुत तगड़ा प्लेयर है… हमारी बेटी को खुश रखेगा।”
पापा की भारी आवाज में जवाब मिला,
“वो तो है। थोड़े दिन दर्द होगा, फिर उसको मजा आने लगेगा। पहली रात में सबके साथ ऐसा ही होता है।”
मम्मी हल्के से हँसीं,
“आपने भी मुझे बहुत रुलाया था उस रात। याद है?”
पापा की आवाज में मुस्कान थी,
“अब तुझे भी मजा आता है ना? चल, अब तू अलमारी में से कंडोम निकाल।”
मम्मी बोलीं,
“कंडोम क्यों? मुझे बिना कंडोम के ही मजा आता है।”
पापा ने जवाब दिया,
“आज एक राउंड गांड मारनी है… इसलिए कंडोम ला। दर्द कम होगा।”
मैं दरवाजे के बाहर खड़ी यह सब सुन रही थी। मेरा चेहरा गर्म हो गया था। अंदर कपड़ों के सरकने की हल्की आवाजें आने लगीं। फिर मम्मी की धीमी आवाज सुनाई दी। लग रहा था वो घुटनों के बल बैठ गई हैं। पापा की साँसें भारी हो रही थीं। मम्मी की गीली आवाजें आने लगीं — वो पापा का मुँह में ले चुकी थीं। कभी-कभी पापा की हल्की आहें भी निकल रही थीं।
कुछ देर यह सिलसिला चला। फिर पापा की आवाज आई,
“बस… अब पीछे हो जा।”
मम्मी की हल्की सहमति भरी आवाज आई। फिर बेड की हल्की कराहट सुनाई दी। मम्मी की आवाज में दर्द और दबी हुई सिसकी थी। पापा धीरे-धीरे शुरू कर रहे थे। मम्मी बीच-बीच में “आह… धीरे…” कह रही थीं। धीरे-धीरे आवाजें तेज होने लगीं। पापा के धक्कों की आवाज और मम्मी की दबी चीखें मिलकर गूँज रही थीं।
मैं और ज्यादा देर वहाँ नहीं खड़ी रह सकी। दिल की धड़कन बहुत तेज हो चुकी थी। मैंने चुपचाप कदम बढ़ाए और अपने कमरे में वापस आ गई। दरवाजा बंद किया। छेद की तरफ एक बार फिर देखा — दीदी और जीजू अब पूरी तरह सो चुके थे। दीदी ब्रा-पैंटी में करवट लिए हुए थी, जीजू अंडरवियर में उसकी तरफ पीठ किए हुए सो रहा था। दोनों थककर गहरी नींद में थे।
मैं अपने बिस्तर पर लेट गई। आँखें बंद कीं। लेकिन नींद देर तक नहीं आई। रात भर की सारी आवाजें — दीदी की चीखें, जीजू की बातें, और अब मम्मी-पापा की आवाजें — बार-बार दिमाग में घूम रही थीं। धीरे-धीरे थकान ने मुझे भी जकड़ लिया। आखिरकार मैं भी सो गई।
घर में अब सन्नाटा छा चुका था। तीनों कमरों में लोग सो चुके थे। रात बीत चुकी थी।
सुबह हुई तो घर में हल्की हलचल शुरू हो गई। मैं जब उठी तो देखा कि दीदी के कमरे का दरवाजा आधा खुला है। दीदी बिस्तर से नीचे उतर रही थी। उसकी चाल बिल्कुल सामान्य नहीं थी। वो बहुत धीरे-धीरे कदम रख रही थी, जैसे हर कदम पर दर्द हो। कमर थोड़ी झुकी हुई थी और वो दीवार का सहारा लेकर चल रही थी। मुझे देखते ही उसने जल्दी से मुस्कुराने की कोशिश की, लेकिन चेहरे पर थकान और दर्द साफ झलक रहा था।
नाश्ते के लिए सब टेबल पर बैठे। मम्मी-पापा, मैं, छोटा भाई, दीदी और जीजू। दीदी बहुत देर तक कुर्सी पर ठीक से बैठ नहीं पा रही थी। वो बार-बार करवट बदलती और हल्की सिसकी लेती। जीजू सामान्य व्यवहार कर रहा था, जैसे रात को कुछ हुआ ही न हो। नाश्ते में सबने चुपचाप खाया। बातें कम हो रही थीं। मम्मी बार-बार दीदी की तरफ देख रही थीं।
नाश्ता खत्म होने के बाद जीजू तैयार हो गए। उन्होंने सामान समेटना शुरू कर दिया। दीदी अपने कमरे में कपड़े बदलने चली गईं। मम्मी भी उनके साथ अंदर चली गईं। मैं बाहर गलियारे में खड़ी रह गई। दरवाजा पूरी तरह बंद नहीं था, इसलिए अंदर की बातें हल्की-हल्की सुनाई दे रही थीं।
मम्मी की आवाज आई,
“ज्यादा मत चिल्लाना बेटी… पूरे मजे करना। दो-तीन दिन दर्द रहेगा, फिर आदत पड़ जाएगी। डर के मारे खुद को मत रोकना।”
दीदी ने कुछ जवाब दिया जो साफ नहीं सुनाई दिया। थोड़ी देर बाद मम्मी कमरे से बाहर आईं। उन्होंने सीधे जीजू के पास जाकर धीमी आवाज में कहा,
“मेरी बेटी का ख्याल रखना। ज्यादा परेशान मत करना। और एक बात… अभी चार-पाँच साल तक पीछे से मत करना। बहुत दर्द होता है। मेरी बेटी अभी बहुत छोटी है।”
मैंने सुन लिया। मुझे साफ समझ आ गया कि मम्मी दीदी की गांड की बात कर रही थीं। जीजू ने सिर्फ सिर हिलाया और “जी” कह दिया। मम्मी की बात में चिंता साफ थी।
थोड़ी देर बाद मैं दीदी के कमरे में चली गई। दीदी अभी भी कपड़े बदल रही थी। वो ब्रा और पैंटी में खड़ी थी। उसकी दोनों टाँगें थोड़ी फैली हुई थीं और वो बहुत धीरे-धीरे साड़ी संभाल रही थी। उसके जाँघों के अंदरूनी हिस्से पर हल्के निशान और लालिमा साफ दिख रही थी। चाल से और शरीर की हालत से साफ पता चल रहा था कि रात को बहुत जोरदार और लंबी चुदाई हुई थी। दीदी ने मुझे देखा तो थोड़ा शरमा गई।
“आ गई तू…” उसने धीमी आवाज में कहा।
मैं पास जाकर बैठ गई। थोड़ी देर दोनों चुप रहे। फिर मैंने पूछा,
“कैसा लग रहा है?”
दीदी ने साँस छोड़ते हुए कहा,
“चलने में तकलीफ हो रही है… बैठने में भी। रात को बहुत हो गया।”
मैंने और कुछ नहीं पूछा। थोड़ी देर बाद दीदी ने कहा,
“मैं सीधा एक महीने बाद ही आऊँगी। दोनों हनीमून के लिए जा रहे हैं।
मैंने हल्के से मुस्कुराते हुए कहा,
“मेरे लिए भी कुछ लेते आना।”
दीदी ने हल्की मुस्कान दी और सिर हिलाया। फिर उसने साड़ी पहननी शुरू की। कपड़े पहनते समय भी उसकी हरकतें धीमी और सावधान थीं। ब्लाउज के हुक लगाने में भी उसे तकलीफ हो रही थी। आखिरकार वो पूरी तरह तैयार हो गई। चेहरे पर हल्की मेकअप था, लेकिन आँखों में थकान छुप नहीं पा रही थी।
नीचे आकर सबने विदाई की। मम्मी ने दीदी को गले लगाया और फिर से कुछ धीमें शब्दों में समझाया। पापा ने जीजू से हाथ मिलाया। मैंने भी दीदी को गले लगाया। दीदी ने मेरे कान में सिर्फ इतना कहा, “संभाल के रहना।”
फिर दोनों कार में बैठ गए। जीजू ने इंजन चालू किया। दीदी ने एक बार पीछे मुड़कर घर की तरफ देखा। कार धीरे-धीरे गली से निकल गई।
घर में फिर से सन्नाटा छा गया। मम्मी चुपचाप किचन की तरफ चली गईं। पापा अखबार लेकर बैठ गए। मैं देर तक गेट के पास खड़ी रही। दीदी अब सच में किसी और घर की हो चुकी थी।
एक महीना बीत चुका था। दीदी ने फोन पर कई बार बात की थी, लेकिन घर आने की बात ठोस नहीं हुई थी। आखिरकार एक दिन उसने मम्मी को फोन करके कहा कि वो घर आना चाहती है। मम्मी-पापा ने तय किया कि हम सब जाकर उसे लेंगे। अगले दिन सुबह मम्मी, पापा, मैं और छोटा भाई चारों उनके घर की तरफ निकल पड़े।
उनका घर शहर के दूसरे हिस्से में था। काफी बड़ा और अच्छा मकान था। दो मंजिला, आगे बगीचा, और पीछे पार्किंग। गेट पर जीजू खड़े हमें देखकर मुस्कुराए। उन्होंने स्वागत किया और अंदर ले गए। दीदी हॉल में खड़ी थी। एक महीने में वो थोड़ी और निखरी हुई लग रही थी। उसने मुझे देखते ही गले लगा लिया। थोड़ी देर दोनों बहनें एक-दूसरे को पकड़े रहीं।
“कैसे हो?” मैंने पूछा।
“ठीक हूँ… अब आदत पड़ गई है,” दीदी ने हल्के स्वर में कहा।
जीजू ने सबको बैठाया। नाश्ता करवाया। फिर दीदी ने कहा, “चलो, घर दिखाऊँ।”
वो हमें पूरा घर घुमाने लगी। नीचे हॉल, किचन, पूजा रूम, एक गेस्ट रूम। ऊपर जाते ही दो बड़े बेडरूम और एक छोटा स्टडी रूम था। दीदी का और जीजू का कमरा सबसे बड़ा था। उसने हमें अंदर ले गई। कमरा साफ-सुथरा और अच्छी तरह सजा हुआ था। बड़ी सी डबल बेड, एक तरफ अलमारी, दूसरी तरफ ड्रेसिंग टेबल, और खिड़की के पास एक आराम की कुर्सी। दीदी एक-एक कोना बता रही थी — “यहाँ कपड़े रहते हैं, यहाँ जेवरों का बॉक्स है, वहाँ जीजू का लैपटॉप रहता है।”
इतने में उसकी नज़र एक दराज पर गई जो थोड़ा खुला हुआ था। उसने जल्दी से बंद करने की कोशिश की, लेकिन दराज पूरा खुल गया। अंदर नज़र आया — कई अलग-अलग तरह के कंडोम के पैकेट, कुछ रंगीन, कुछ लंबे आकार वाले। उनके साथ कुछ सेक्स टॉयज़ भी रखे थे — छोटी-बड़ी आकार की चीज़ें, लुब्रिकेंट की ट्यूबें। दीदी का चेहरा एकदम लाल हो गया। उसने झट से दराज बंद कर दिया और बिना कुछ कहे बोली,
“चलो… अब निकलते हैं। नीचे चलो।”
मैंने कुछ नहीं कहा। सिर्फ नज़रें झुका लीं। मम्मी-पापा और भाई थोड़ा आगे थे, उन्होंने कुछ देखा नहीं। हम सब नीचे आ गए। थोड़ी देर और बातें हुईं। फिर हमने विदा ली और अपने घर वापस आ गए।
घर पहुँचकर शाम को पूरी फैमिली बैठकर बातें करने लगी। मम्मी-पापा उनके घर के बारे में पूछ रहे थे — कितना बड़ा है, इलाका कैसा है, जीजू के माता-पिता कैसे हैं। दीदी सामान्य बातें बता रही थी। परिवार अच्छा है, घर आरामदायक है, जीजू ख्याल रखते हैं। किसी ने भी उनके निजी जीवन या रात के बारे में एक शब्द नहीं पूछा। ना दीदी ने कुछ कहा, ना किसी और ने। बातें घर, खाने-पीने और रिश्तेदारों तक ही सीमित रहीं।
रात का खाना खाने के बाद सब अपने-अपने कमरों में चले गए। मैंने दीदी से कहा, “थोड़ी देर मेरे कमरे में चल।”
दीदी मेरे साथ आ गई। दरवाजा बंद होते ही दोनों बिस्तर पर बैठ गए। थोड़ी देर खामोशी रही। फिर दीदी ने धीमी आवाज में पूछा, “क्या देखा तूने दराज में?”
मैंने सिर हिलाया।
“हाँ… थोड़ा दिख गया।”
दीदी की नज़रें झुक गईं। उसने साँस छोड़ते हुए कहा, “वहाँ कई चीज़ें रहती हैं। अब… आदत सी हो गई है।”
मैंने और कुछ नहीं पूछा। दोनों थोड़ी देर चुपचाप बैठे रहे। कमरे में सिर्फ पंखे की आवाज गूँज रही थी। एक महीने बाद फिर से दोनों बहनें एक कमरे में थीं, लेकिन बहुत कुछ अनकहा रह गया था।
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