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लव स्टोरी

फार्महाउस की दो रातें 5

· Online Admin

आखिरी दिन की सुबह थोड़ी देर से हुई। शरीर में दर्द था – जाँघों में, कमर में, कंधों में। लेकिन वो दर्द मीठा लग रहा था। मैंने आँखें खोलीं तो वो मेरे बगल में लेटी थी, एक हाथ मेरे सीने पर रखा हुआ। रात भर की मेहनत के निशान उसके शरीर पर और साफ दिख रहे थे।

मैंने धीरे से उसे जगाया। उसने आँखें खोलीं और मुस्कुराई।

“आखिरी दिन है…” उसने धीमी आवाज़ में कहा।

“हाँ,” मैंने जवाब दिया। “आज पूरा निकालेंगे।”

सुबह-सुबह ही वो मेरे ऊपर चढ़ गई। बिना ज्यादा बात किए कंडोम पहनाया, लुब्रिकेंट लगाया और बैठ गई। इस बार मूवमेंट धीमा था। दोनों थके हुए थे, लेकिन भूख बाकी थी। उसने मेरे सीने पर हाथ रखे और धीरे-धीरे ऊपर-नीचे होने लगी। मैंने उसके स्तन सहलाए, कमर पकड़ी। लगभग पंद्रह मिनट बाद दोनों साथ पहुँचे।

नहाकर हमने नाश्ता किया। कुक ने फिर से तैयार रखा था। खाना खाते समय उसके पैर मेरे पैर से छू रहे थे। आँखों में वो वाली चमक थी – आज आखिरी दिन है, इसलिए और कुछ भी बचाना नहीं है।

नाश्ते के बाद मैंने उसे स्विमिंग पूल में ले जाने का फैसला किया। धूप अच्छी थी। पानी ठंडा। दोनों नंगे ही पानी में उतर गए। पहले थोड़ी देर तैरते रहे, फिर मैंने उसे पूल के किनारे वाले स्टेप्स पर बिठाया। पानी के अंदर ही एंट्री की। ठंडे पानी और उसके गर्म शरीर का कॉन्ट्रास्ट पागल कर रहा था। मैंने उसके कूल्हे पकड़कर जोर-जोर से पेलना शुरू किया। पानी छलक रहा था। उसकी कराहें पूल के चारों ओर गूँज रही थीं।

पूल में हमने दो राउंड किए। एक किनारे पर, दूसरा पानी के बीचों-बीच खड़े होकर। आखिर में जब निकले तो दोनों के शरीर काँप रहे थे।

दोपहर में हम गार्डन में चले गए। पेड़ों की छँव में झूला था। मैंने उसे झूले पर बैठाया। पहले मुँह से शुरू किया। फिर कंडोम पहनकर झूले पर ही एंट्री की। झूला हर धक्के के साथ आगे-पीछे हो रहा था। उसकी आवाज़ें बाग में फैल रही थीं। हमने वहाँ लगभग आधा घंटा बिताया।

उसके बाद टेरेस पर गए। खुली हवा में, धूप में। मैंने उसे कुर्सी पर लिटाया। टाँगें कंधों पर रखीं और गहराई तक पेलने लगा। हवा उसके बालों को उड़ा रही थी। पसीना चमक रहा था। टेरेस पर हमने तीन राउंड किए – एक मिशनरी, एक कॉउगर्ल, एक पीछे से।

शाम होने से पहले हम जकूज़ी में उतरे। गर्म पानी, बबल्स। मैंने उसे अपनी गोद में बिठाया। पीछे से एंट्री की। एक हाथ उसके स्तन पर, दूसरा क्लिट पर। पानी के अंदर मूवमेंट चिकना और लंबा था। जकूज़ी में हमने लगभग चालीस मिनट बिताए। दो बार पहुँचे।

शाम के सात बज चुके थे। शरीर अब सच में थक चुका था। लेकिन मन अभी भी और चाह रहा था। हम बेडरूम में आए। बिस्तर पर गिरे।

आखिरी रात की शुरुआत हुई।

मैंने लाइट डिम की। उसे नंगा किया। खुद भी नंगा हुआ। इस बार बहुत धीरे शुरू किया। पूरे शरीर को चूमा – गर्दन, स्तन, पेट, जाँघें, फिर बीच में। जीभ से लंबे समय तक चाटा। जब वो काँपने लगी तो कंडोम पहना और मिशनरी में एंट्री की। आँखों में आँखें डाले, धीरे-धीरे मूव करते हुए। किस करते हुए। लगभग आधा घंटा सिर्फ इसी तरह। जब पहुँचे तो दोनों के आँसू तक निकल आए थे – मज़े के।

थोड़ी देर आराम करके फिर से शुरू किया। इस बार उसने ऊपर से। कॉउगर्ल। तेज़ और जोरदार। बिस्तर चरमरा रहा था। फिर पीछे से। फिर साइड से। फिर खड़े होकर। हर पोजीशन में हमने समय निकाला। रात के लगभग बारह बज गए थे जब हमने आखिरी से पहले का राउंड खत्म किया।

आखिरी राउंड बहुत लंबा था। लगभग पैंतालीस मिनट। सिर्फ एक-दूसरे को महसूस करते हुए। कोई जल्दी नहीं। हर धक्का गहरा। हर कराह साफ। जब आखिर में पहुँचे तो दोनों के शरीर पूरी तरह ढीले पड़ गए।

मैंने कंडोम हटाया और उसे बाँहों में भर लिया। कमरे में सिर्फ हमारी साँसें बची थीं।

“दो दिन में कितनी बार हो गया?” उसने थकी आवाज़ में पूछा।

मैंने गिना। “लगभग बीस… शायद इससे भी ज्यादा।”

वो हँसी। “याद रहेगा ये वीकेंड।”

“हमेशा,” मैंने कहा।

हम दोनों चादर ओढ़कर लेट गए। उसका सिर मेरे सीने पर था। मैंने उसके बालों में उंगलियाँ फेरीं। बाहर रात गहरी होती जा रही थी। फार्महाउस शांत था। कुक सो चुका होगा।

सुबह हम दोनों उठे। आखिरी बार एक साथ नहाए। इस बार सिर्फ साफ होने के लिए। कोई सेक्स नहीं। सिर्फ एक-दूसरे को सहलाते हुए। नाश्ता किया। फिर पैकिंग शुरू की।

जब उसकी कार निकलने वाली थी, तो गेट पर खड़े होकर मैंने उसे गले लगा लिया। लंबा किस किया।

“अगली बार फिर आयेंगे,” उसने कहा।

“ज़रूर,” मैंने जवाब दिया।

कार निकल गई। मैं खड़ा-खड़ा देखता रहा जब तक वो नज़रों से ओझल नहीं हो गई।

फार्महाउस अब खाली लग रहा था। लेकिन दो दिन की यादें हर कोने में बाकी थीं – लिविंग रूम का सोफा, बेडरूम की बेड, पूल का पानी, जकूज़ी की गर्माहट, गार्डन का झूला, टेरेस की हवा।

मैं अंदर आया। बिस्तर पर लेट गया। आँखें बंद कीं। उसके शरीर की खुशबू अभी भी चादरों में बसी हुई थी।

दो दिन। लगभग बीस बार। हर जगह। हर पोजीशन।

और एक याद जो जिंदगी भर रहेगी।

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